बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६० ) सतसई-सटीक ।
हेप्रीतम ! तुरतका मैथुन किसप्रकार छिपसकताहै, दृष्टि
मिल कर तुम्हारे नेत्र मुरतेहैं, और कनौड़ी दृष्टिही यह तु-
म्हारे दोष ढंढोरा देकर कथन करताह । वृत्यनुप्रासलो-
कोक्ति ॥ १६९ ॥
पावकसों नैननि लग्यो, जावक लाग्यो भाल ।
मुकर होहुगे नकम,मुकुर विलोको लाल ॥१७०॥
आँखोंमें आगसी लगीहै, माथेमें जो महावर लगाहै, थोड़ी
देरमें मुकर जाओगे,इसकारण हेलाल ! तनक दर्पणमें अपना
मुख तो देखो । पूर्णोपमा जमकलाटानुप्रास ॥ १७० ॥
प्राणप्रिया हियमें बसै, नखरेखा शशि भाल ।
भलो दिखायो आन यह, हरिहररूपरसाल १७१
प्राणप्यारी तुम्हारे हृदयमें निवास करतीहै, जैसे विष्णुके
हृदयमें लक्ष्मी, नखकी लकीर शिरपर है जैसे शिवके माथे
पर चन्द्रमा, यह अपना रसाल शिव और विष्णुका भलारूप
दिखाया । रूपकालंकार ॥ १७१ ॥
नखरेखा सोहै नई, अरु सोहै सब गात ।
सौहैं होत न नैन यह, तुम सौहैं कत खात १७२
नवीन नखप्रहारकी रेखा शोभा पातीहै, सब शरीर
आलस्य भरैहैं, और यह नेत्र सामने नहीं होतें फिर तुम सौ-
गन्ध क्यों खातेहो । जमकालंकार ॥ १७२ ॥