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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

( ५२ ) सतसई-सटीक ।
मलिन देह वेई वसन, मलिन विरहके रूप ।
पिय आगम औरै बढ़ी, आनन ओप अनूप १४३
मैली देह और वेई मलीन वस्त्र विरहके रूपमें हैं, परन्तु
प्रीतमके आगमनसे मुखपर अनूप ज्योति बढ़ी। भेदकांति-
शयोक्ति ॥ १४३ ॥
कियो सयानी सखिनसों, नहिं सयान यह भूल ।
दुरै दुराई फूललों, क्यों पिय आगम फूल ॥ १४४॥
हे आली ! तैने जो सखियोंसे यह चतुराईकी सो यह
तेरी भूल है, प्यारेकी आगमनकी प्रफुल्लता फूलकी सुगंधि
के समान छिपाये नहीं छिपती । पूर्णोपमा ॥ १४४ ॥
रहे बरोठेमें मिलत, पिय प्राणनके ईश ।
आवत आवतकी भई, विधिकी घरी घरीश १४५
द्वारके बाहर जो प्राणनाथ स्नेही जनोंसे मिलने लगे तो
वह आते आतेकी घड़ी प्यारीको ब्रह्माकी घड़ीके समान
हुई । धर्मवाचकलुप्तालंकार ॥ १४५ ॥
भेंटत बनत न भावतो, चित तरसत अतिप्यार ।
धरति उठाय लगाय उर, भूषण वसन हथ्यार ॥
ससुरालमें प्यारेसे मिलनातो बनता नहीं और प्यारसे
चित्त तरसता है, इसकारण उनके भूषण वसन हथियार उठाकर