बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. (१७)
अवधिके नाम टलनेसे प्यारी मनमें ओरहीसी होगई और
दूसरे बौरे अर्थात् मौले हुए आमने तो उसे बावलीही करडा-
ला। भेदकातिशयोक्ति ॥ १२६ ॥
छप्यो नेह कागज हिये, भई लखाइ न टांक ।
विरहतचे उघऱ्योसु अब, सैहुँडकोसोआँक १२७
जो कागजरूपी प्रीति निर्मल मनमें छिपी थी और थोडी
भी प्रसिद्ध न हुई सो अब थूहरके दूधके लिखे अक्षरसी
विरहकी आगसे सिककर खुली। पूणो और गलोभांर आया
अक्षर आगपर सेकनेसे चमकते हैं ॥ प्र अलंकार ॥१२७॥
चित तरसत मिलत न बनत, वसाणेश ।
छाती फाटत जात सुनि, टाटी ओटविदेश १२८
मन तरसताहै परन्तु पडोसके घरमेंमिनी इन साधा-
नहीं बनता। टट्टीकी ओटमें लम्बी साँसों जो वर्षाकालमें
जातीहै नायकका वचन सखीसे विशेषो॥ १२८ ॥
रहि हैं चंचल प्राण यह, कहि भनअथ्यौभान।
ललनचलनकीचितधरी, करत मलान ॥ १२६ ॥
सखी अब यह मेरे चंचल प्राण हाथ पकड़ नटने
प्यारेने तो चलनेकी चित्तमें धरी है त होगया दो घडी
ओट होनेसे कल नहीं पड़तीहै, मग..