बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. (६१)
पल सोहैं पग पीकरँग,छल सो हैं सब वैन ।
बल सोहैं कत कीजियत, यह अलसोहैं नैन १७३
पीकके रंगसे पगी पलकें शोभित होतीहैं, और छलसे
तुम्हारी सब बातें शोभितहैं, वलसे सन्मुख यह आलस्य
भरी आँखें क्यों करतेहो । वृत्यनुप्रास ॥ १७३ ॥
पटसों पोंछ परी करो, खरी भयानक वेषि ।
नागनि ह्वै लागति दृगनि, नागवेलिरँगरेषि १७४
वस्त्रसे पोंछकर दूर करो यह तुम्हारा बहुत भयानक
वेषहै, यह तुम्हारी आँखोंमें लगी हुई पानकी रेख मेरी
आँखोंको सांपन होकर काटती है। लुप्तोत्प्रेक्षालंकार॥१७४॥
जिहि भामिनि भूषण रच्यो,चरण महाउर भाल।
उही मनो अँखियां रंगी,ओठनिके रँगलाल १७५
जिस प्रियाने शृंगार बनाय अपने पाँवका महावर तुम्हारे
माथेमें लगाई,उसीने अपने होठोंके रंगसे मानो तुम्हारी आंखें
रंगीहैं, आशय यह कि, उसने मान किया तुम पांव पडे इससे
माथेमें महावर लगगया और रतिमें जागे इससे नेत्र लालहैं ।
वस्तूत्प्रेक्षा असंगति ॥ १७५ ॥
गडेवडेछविछाकिछकि, छिगुनी छोर छुटै न ॥
रहे सुरँगरँग रंगि उही,नहदी महँदी नैन ॥१७६॥