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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

( ४४ ) सतसई-सटीक ।
कि, पडोसिनके संग कुछ प्यारेने मुसकान की सो प्यारीने देख
लिया, मानकर बैठी तब वही परोसिन प्यारेकी ओरसे सम-
झाने आई, यही उसकी दृढ ढिठाई है, और हितकारी बनकर
प्रीतमके निरपराध होनेके संदेश चतुराईसे सुनाकर कहा
मुस्कुराहटमें मान नहीं चाहिये यदि रतिका चिह्न हो तो
मान चाहिये [काकोक्ति] काव्यलिंग सूक्ष्मालंकार ॥११८॥
परकीया अन्यसंभोग दुःखिता ।
गह्यो अबोलो बोलप्यो, आपै पठै वसीठ ॥
दीठ चुराई दुहुँनकी, लखि सकुचोहीं दीठ ११९
सखीको प्यारेके बुलानेको भेजकर प्रिया आप मौन गहे
रही, उनकी दोनोंकी सकुचोहीं दृष्टि देखकर अपनी दृष्टि
चुराई । अन्यसंभोगदुःखिता प्रियाकी सखीका वचन सखीसे।
आभिता अलंकार ॥ ११९ ॥
हठंहितकरप्रीतमलियो, कियो जु सौति शृंगार ॥
अपनेकर मोतिन गह्यो, भयो हराहरहार॥१२०॥
हठ और प्रीतिकरके जो प्यारेने हार लिया उससे सौति-
नका शृंगार किया, अपने हाथके मोतियोंका गुँथा हार सौ-
तिनके गलेमें देख वह हार महादेवजीके हार ( सर्पहार ) सा
हुआ । व्याघातालंकार [ दोहा-सुखद दुखद होजाय जो