बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. ( ५७ )
घनाकुंज है बहुतसे मेघोंका अँधेरा है महाकाली अँधेरी
रात है, हे कृष्ण ! तोभी यह बाला जाती हुई दीपशिखाके
समान नहीं छिपैगी । विशेषोक्ति लुप्तोपमेयसंकर ॥ १५९ ॥
युवति जौन्हमें मिलगई, नैक न होति लखाइ ।
सौंधेके डोरेलगी, अली चली सँगजाइ ॥१६०॥
वह बाला चाँदनीमें मिलगई किंचित् भी नहीं दिखाई
देती सुगंधकी डोरसे लगी सखी बालाके संग चली जाती है।
उन्मीलितालंकार । सुगंधिसे ज्ञान हुआ गौरतासे नहीं १६०॥
निशि अँधियारी नील पट, पहरिचली पियगेह ।
कहो दुराई क्यों दुरै, दीपशिखासी देह ॥१६१॥
अँधेरी रात है नीलपट पहरकर पियाके घर चली [गर्वि-
ताबोली] कहो इसपरभी यह दीपकी शिखासीदेह छिपायेसे
अबभी कैसे छिपेगी । विशेषोक्ति उत्तरालंकार ॥ १६१ ॥
अरी खरी सटपट परी, विधु आधे मग हेरि ।
संगलगे मधुपन लई, भागि न गली अँधेरि १६२
हे सखी ! आधे मार्गमें चन्द्रमाको देखकर मुझे बहुत
व्याकुलता हुई भौंरोंके संग लगनेपर भाग्यहीसे अँधेरी गली
पाई अर्थात् गली अँधेरेमें जाकर भौंरोंसे छुटी । प्रहर्ष-
णालंकार [दोहा-कार्यसिद्ध हो बिन यतन, मनमें हर्ष अपार॥