बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
प्रथमशतक १. ( ३३ )
नहीं करती पूसके महीनेमें निकला हुआ यह पसीनाही
इस बातको प्रगट कियेदेता है । प्रथमविभावना ॥ ८६ ॥
सही रँगीले रतिजगे, जगी पगी सुखचैन ।
अलसोंहैं सौहैं किये, कहैं हँसोहे नैन ॥ ८७ ॥
यह सत्य है कि, रँगीले रात तेरे संग जागे और सुखचैन
में पग कर तूभी जगी, आलसभरी हँसौही तेरी आँखें मुझसे
सौगंध करके कहेदेती हैं । एकके जागनेसे दोनोंका जागना
होताही है फिर दोनोंका पृथक् कहनेका कारण यह कि, प्रीतम
रँगभरेका जागना सहज समझा परन्तु तेरे जागनेसे उसका
रतिपूर्वक जागना जाना । अनुमान ॥ ८७ ॥
औरै ओप कनीन कन, गनी धनी शिरताज ।
मनी धनीके नेहकी, बनी छनी पटलाज ॥८८॥
तेरी आँखोंके कनीनकाओंके तारेकी औरही चमकहै इस
कारण मैंने तुझे ( धनी ) बहुतोंकी शिरताज ( गनी ) गिनी
अर्थात् जाना तू पियाके प्रेमकी मणि बनीहै तू लाजमें छिपाती
है सो यह लाजरूपी पटमें छन निकली है अर्थात् जैसे निर्मल
मणिकी कांति वस्त्रमें छनकर निकलती है तैसे छिपानेसे तेरा
नेह नहीं छिप सकता । भेदकांति० ॥ ८८ ॥
यह वसंत नखरी गरम, अरी न शीतल वात ।
६
( ३४ ) सतसई-सटीक ।
कह क्यों प्रगटे देखियत, पुलकि पसीजे गात ८९
अरी यह वसन्तरुतुहै, इसमें न बहुत गरम और न बहुत
ठंढी पवनहै, परन्तु यह तो कह कि, तेरे अंगमें पसीजे हुए
रोमांच क्यों दीखते हैं, । प्रथम विभावना ॥ ८९ ॥
मेरे बूझे बात त, कत बहरावति बाल ।
जगजानी विपरीतरति, लखिबिंदुलीपियभाल ९०
हे बाले ! मेरे बूझनेसे क्यों बात बहराती है, प्रीतमके माथे
पर बिन्दी देखकर तेरी विपरीत रति सबने जानली । अनु-
मान ॥ ९० ॥
सुदुतिदुराईदुरतिनहिं, प्रगटकरतिरतिरूप ।
छुटे पीकऔरै उठी, लालीओठअनूप॥९१॥
हे सुदुति ! सुन्दर दांतवाली तेरी अच्छी शोभा छिपाई
नहीं छिपती, कामकेलिका रूप प्रगट करती है, पीक छूटके
होठमें और भी नई लाली खुली कि, जिसकी उपमा नहीं
है, पीक छूटनेका कारण यह कि, सब रंग प्रीतमके अधरोंने
लेलियाहै, और उसके दुरानेका कारण यह कि, यह स्त्री पर-
कीयाहै, इसकारण स्वामी आनकर पूछे कि, पान कहां खाया
तब उत्तर न बनेगा । भेदकांतिशयोक्ति ॥ ९१ ॥
रँगीसुरतिरँग पियहिये, लगी जगी सबराति ।
प्रथमशतक १. ( ३५ )
पैंडपैंडपरठकिकै, ऐंडभरी ऐंडाति ॥ ९२ ॥
कामकेलिमें रँगकर पियाकी छातीसे लग यह सारी रात
जागीहै, इससे पग पग पर खडी होकर गर्वभरी ऐंडाती है
स्वभावोक्ति ॥ ९२ ॥
तरवन कनक कपोल दुति, बिचही बीच बिकान।
लाल लाल चमकतिचुनी, चौकाचिह्न समान ९३
जड़ाऊ सोनेकी बनी ढेरीका सोना कपोलकी कांतिहीमें
मिलगया लाल लाल चुन्नी दाँतके चौकेके समान चमकती है
पूर्णोपमा ॥ ९३ ॥
पटको ढिग कत ढापियत, शोभित सुभग सुभेष ।
हदरदछदछबि देखियत,सदरदछदकीरेष॥९४॥
इसे घूंघटपटके निकट क्यों ढकतीहो, यह तो सुन्दररस
स्वरूपसे शोभा देती है तुरतके दांतोंके घावकी लकीर हद
भर होठोंकी शोभामें दिखाई देती है । विभावना और
वृत्यनुप्रास ॥ ९४ ॥
कहि पठई मनभावती, पिय आवनकी बात ।
फूली आँगनमें फिरै, आँगन आँग समात॥९५॥
जिस समय प्यारेने प्यारीके मनकी चाही अपन आवनकी
( ३६ ) सतसई-सटीक ।
बात कहकर भेजी उससे प्रसन्नहो आँगनमें फिरने लगी श-
रीरमें शरीर नहीं समाता । लोकोक्ति ॥ ९५ ॥
फिरिफिरिविलखीहैलखति, फिरिफिरिलेतिउसास।
साईंसिरकचसेतलौं, बीत्यो चुनत कपास ॥ ९६ ॥
बारबार अनमनीहो देखती है, और बार २ ऊँची सांस
लेती है, स्वामीके शिरके श्वेतबालोंके समान बीतीहुई क-
पास चुनती है, अनुशयना अपने क्रीडाके स्थान कपासके
खेत नष्ट होनेपर शोच करतीहै, अथवा कपासके खेतमें सं-
केत स्थान था उसके नष्ट होनेसे दुःख हुआ। पूर्णोपमा दृष्टा-
न्तालंकार ॥ ९६ ॥
सनसूख्योबीत्योबनों, ऊखौ लई उखारि ।
अरीहरीअरहरअजौं, धर धर हर हिय नारि॥९७॥
सन सूखगई कपासका बन बीत गया, गन्ने उखाड़ लिये
हे आली! अभी अरहर हरीहै, मनमें धीरज रख, आशय यह
कि, तू इन वस्तुओंके निबट जानेसे अभी शोच मतकरै यह
अरहरका खेत अभी अच्छा संकेत स्थानहै, वीप्सा छेकानु-
प्रास “हरी २ वीप्सा” ॥ ९७ ॥
सतर भौंह रूखे वचन, करति कठिन मन नीठि।
कहाकरौं हैजाति हरि, होरि हँसोही दीठि ॥९८॥
प्रथमशतक १. ( ३७ )
सखीने प्यारीसे मान करनेको कहा तब उसने कहा आली
टेढी भौंहें कर रूखे वचन कहतीहूं और नीठ-( कठिनाई )
कर कड़ा मन भी करा पंरतु क्या करूं कृष्णके देखतेही
मेरी दृष्टि हँसौही होजाती है । तृतीय विभावना ॥ ९८ ॥
तूहुं कहति हौं आपहू, समझति बहुत सयान ।
लखिमोहन जो मनरहै, तो मनराखोंमान॥९९॥
तू भी कहती है और आपभी मैं बहुत चतुराई समझूँ हूं
परन्तु मोहनको देखकर जो मन मेरे पास रहे; तो मनमें मा-
नराखसकूं आशय यह कि, उन्हें देखतेही मन हाथसे निकल
जाय है फिर मान कहांसे होय । विशेषोक्ति सम्भावना॥९९॥
दहैं निगोडे नैन यह, गहैं न चेत अचेत ।
हौंकसिकै रिसकोकरौं;यहनिरखेहँसिदेत ॥१००॥
हे सखी ! यह मेरी निगोड़ी आँखें जरें ऐसी अचेत हैं कि,
चेत पकड़तीही नहीं मैं हठकर मानको करतीहूं परन्तु यह
कृष्णको देखतेही हँसदेते हैं । विभावना । हँसनेसे रिसनहीं
रहती ॥ १०० ॥
इति कविवर बिहारीलालकी सतसईमें पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत
भावप्रकाशिकाटीकासहित प्रथमशतक पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
( ३८ ) सतसई-सटीक ।
मोहिं लजावत निलज यह, हुलसि मिलैं सबगात।
भानु उदयकी ओसलों, माननजान्योजात १०१
यह निर्लज्ज नेत्र मुझे लजाते हैं और आप प्रसन्न हो प्यारे
के सब शरीरसे मिले हैं जैसे सूर्य उदयहोनेपर ओस गई नहीं
जानी जाती । इसीप्रकार उनके दर्शनसे मान गया हुआ नहीं
जानाजाता । पूर्णोपमा ॥ १०१ ॥
खिचे मान अपराधते, चलिगे बढे अचैन ।
जुरत दीठितजिरिसखिसी, हँसेदुँहुनके नैन १०२
हे सखी ! पहले तो प्यारीके मानसे प्यारेके अपराध करने
के कारण नेत्ररुके, पीछे परस्पर न देखनेके( अचैन ) दुःखसे
चलायमान होगये, हे सखी! दृष्टिके जुरतेही रिसत्याग दोनोंके
नेत्र हँसपडे । प्रहर्ष अलंकार [ दोहा-काज सफल जहँ यत्न
बिन, कहत प्रहर्षणताहि । यत्नबिना प्यारी मनी, है प्रसन्न
चितचाहि ] ॥ १०२ ॥
रात दिवस हौंसै रहैं, मान न टिक ठहराय ।
जेतो अवगुण ढूँढिये, गुणौ हाथपरिजाय॥ १०३॥
हे सखी ! हमें रात दिन इसी बातकी हौंस रहै है कि, प्यारे
से मान कराकर देखें परन्तु मान ठीक नहीं ठहरता प्यारेका
द्वितीयशतक २. ( ३९ )
जितना अवगुण ढूँढती हूं उतना गुणही हाथमें पड़जाताहै ।
विशेषोक्ति ॥ १०३ ॥
जौलौं लखों न कुलकथा, तौलौं ठिक ठहराय ।
देखे आवत देखबो, क्योंहूं रह्यो न जाय ॥ १०४ ॥
हे सखी ! जबतक घनश्यामको नहीं देखती तवहींतक
कुलकानकी कथा ठीक ठहरती है, उन्हें देखनेसे तो मनमें
देखनाहीं आताहै किसी प्रकारभी रहा नहीं जाता । संभा-
वना ॥ १०४ ॥
कपट सतर भौंहैं करी, मुख सतरौहैं वैन ।
सहजहँसौ हैं जानकर, सौ हैं करति न नैन ॥ १०५॥
हे सखी! हमारे कहनेसे प्यारीने मान किया सो तुम देखो
कपटसे टेढी भौंहैं करी मुखसे क्रोधभरी बातें कहीं परन्तु
स्वभावसे हँसनेवाली जानकर प्यारेके सन्मुख अपनी आँ-
खोंको नहीं करती । छेकानुप्रासयमकालंकार ॥ १०५ ॥
नहिंनचायचितवतिदृगनि, नहिं बोलति मुसकाय।
ज्यों २ रुखरुखोकरति, त्यों २ चितचिकनाय १०६
आँखोंको नचाकर नहीं देखती, मुसकाकर नहीं बोलती,
ज्यों २ रुखरुखोकरतीहै त्यों २ चित्त चिकनाहोता जाता है।
विभावना ॥ १०६ ॥
( ४० ) सतसई-सटीक ।
तोहीको छुट मानगो, देखतही ब्रजराज ।
रही घरिकलों मानसी,मानकियेकी लाज १०७॥
श्रीकृष्णके देखतेही तेरे मनका मान तो छुटके गया,
परन्तु मानकियेकी लाजसे एकघडीतक तो तू मानको माने
रही घडी एक मानकी सीमा न शोभा स्थित रही । कर-
माल ॥ १०७ ॥
कियोजु चिबुक उठाय करि,कंपत कर भरतार ।
टेढीयहटेढीफिरति,टेढेतिलक लिलार ॥ १०८॥
ठोढी उठाकर जो कंपितहाथसे भर्त्ताने प्रियाके माथेपर
तिलक किया, तो स माथेके टेढे तिलकसे यह टेढी हुई
फिरतीहै कि, मुझसे अधिक कोई न्दर नहीं,प्यारीको देख
जो सात्त्विकभाव आ इससे हाथ कांपनेसे टेढातिलक हुआ।
पंचम विभावना ॥ १०८ ॥
तुम सौतिन देखत दई, अपने हियते लाल ।
फिरतिसबनमें डहडही,उहै मरगजीमाल॥१०९॥
सखी वचन हे प्यारे ! सौतोंके देखते जो तुमने अपने हृदय
की माला उसे दी तबसे वह उस मुरझाई हुई मालाको
लिये सबमें डहडही ( हरीभरी ) फिरती है । पंचम विभा-
वना ॥ १०९ ॥
द्वितीयशतक २. (४१)
क्षणक उघारतिक्षणछुवति,राखतिक्षणकछिपाय।
सबदिनपियखंडितअधर,दर्पणदेखतजाय ११०
क्षणमें उघारती क्षणमें छूती और क्षणमें छिपारखती है
सब दिन प्यारेके खंडित अधर दर्पणमें देखती जाती है, ।
जाति अलंकार लाटानुप्रास ॥ ११० ॥
छाला छबीले छैलकों, नवल नेह लहि नारि ।
चूमति चाहति लाय उर, पहरति धरति उतारि १११
प्यारी स्त्री छबीले लालके नये नेहमें उसके दिये छल्लेको
पाकर चूमती है हृदय लगाय देखती है पहरती है उता-
र धरती है । प्रेमजातालंकार परकीया प्रेमगर्विता वर्णन
हुआ ॥ १११ ॥
स्वकीया रूपगर्वितावर्णन ।
दुसहसौति शल्य जुहिय,गनति न नाह विवाह ।
धरेरूपगुणकोगरव,फिरै अछेह उछाह ॥११२॥
हे सखी । सौतनोंका दुस्सह खटका सबके मनमें होताहै
परन्तु यह नायकके विवाहको कुछ नहीं गिनती; अपने
रूप और गुणका गर्व धारणकिये अनन्त आनंदसे फिरती है,
अर्थात् इसने समझरक्खाहै कि, आजतक तो यह मेरी पर-
ख नहीं जानते थे, अब दूसरेके आनेसे जब वे बातें उसमें न
देखेंगे तब मुझे अधिक जानेंगे । पंचमविभावना ॥ ११२ ॥
(४२) सतसई-सटीक ।
सुघर सौतिवश पिय सुनत,दुलहिनदुगुणहुलास ।
लखीसखीतनुदीठिकर,सगरबसलजसहास १ १३
हे सखी ! प्यारेको चतुर सौतिके वश सुनकर दुलहिनको
दूना हुलास हुआ, इसकारण गर्व लाज और हासके सहित
सखीकी ओर दृष्टि करके देखा, आशय यह कि, एक तो
अपना रूप गुण अधिक जानती थी, दूसरे यह कि,जो सुन्दर
के वशीहुए हैं तो मैं भी सुन्दर हूँ मेरे वशमें होंगे, वह चार
दिनकी आई क्या चतुराई करसके है, इसकारण उसे तुच्छ
जान अपनी सखीको देखा । विभावना ॥ ११३॥
हँसि ओठनि बिच कर उच्चै, किये निचो हैं नैन ।
खरे अरे पियके प्रिया, लगी बिरी मुख दैन ११४
होठोंहीके बीच हँसकर हाथ ऊँचाकर निचोहे नैनकिये
प्यारेके अधिक हठ करनेसे प्यारी मुखमें बीरी देने लगी कोई
बीरीका अर्थ रंगनेकी बीरी करते हैं।जातिअलंकार॥११४॥
विथुज्यो जावक सौतिपग,निरख हसी गहि गास ।
सलज हँसौहीं लखिलियो,आधीहँसीउसास ११५
सौतिके पगमें जावक (महावर) बिखरा देखकर ईर्षासे
वह हँसी-लाजसे सौतको हँसती हुई देखकर आधी हँसीमें
प्रियाने ठंढी श्वास ली, अर्थात् पहले तो उसे मूर्खही जाना
द्वितीयशतक २. (४३)
कि, इसको महावरतक लगाना नहीं आता, पीछे उसे हँसता
देखकर जाना कि, यह प्रीतमने लगाया है, उसके हाथ
काँपनेसे यह फैल गया है। तृतीय विषमालंकार (इष्टसे अ-
निष्टमाना) ॥११५॥
छला परोसिनि हाथते, छलकर लियो पिछानि।
पियहिदिखायोलखिबिलखि,रिससूचकमुसकानि॥
प्यारेका छल्ला पहँचानकर पडोसनके हाथसे छलकरके
लेलिया बिलखकर प्रीतमको दिखाया और क्रोधसूचक मुस-
कानसे दुःखी हुई। पर्यायोक्ति अलंकार ॥११६॥
बिलखी लखै खरी खरी, भरी अनख वैराग।
मृगनैनी सैनन भजै, लखि वेणीके दाग॥११७॥
अनमनीहो खडी हुई बहुत क्रोध और उदासीसे देखने
लगी, मृगलोचनी प्यारी प्यारेकी सेजमें और स्त्रीकी चोटीका
चिह्न देखकर सेजपर जानेकी इच्छा नहीं करती। काव्य-
लिंग ॥११७॥
ढीठ परोसिन ईठ ह्वै, कहै जु गहै सयान ॥
सवै सँदेशै कहि कह्यो, मुसकाहटमें मान॥११८
ढीठ पडोसिनने चतुराई पकड़कर दृष्टतासे प्यारेके सब
संदेश कहकर कहा मुसकाहटमें मान न चाहिये, आशय यह
( ४४ ) सतसई-सटीक ।
कि, पडोसिनके संग कुछ प्यारेने मुसकान की सो प्यारीने देख
लिया, मानकर बैठी तब वही परोसिन प्यारेकी ओरसे सम-
झाने आई, यही उसकी दृढ ढिठाई है, और हितकारी बनकर
प्रीतमके निरपराध होनेके संदेश चतुराईसे सुनाकर कहा
मुस्कुराहटमें मान नहीं चाहिये यदि रतिका चिह्न हो तो
मान चाहिये [काकोक्ति] काव्यलिंग सूक्ष्मालंकार ॥११८॥
परकीया अन्यसंभोग दुःखिता ।
गह्यो अबोलो बोलप्यो, आपै पठै वसीठ ॥
दीठ चुराई दुहुँनकी, लखि सकुचोहीं दीठ ११९
सखीको प्यारेके बुलानेको भेजकर प्रिया आप मौन गहे
रही, उनकी दोनोंकी सकुचोहीं दृष्टि देखकर अपनी दृष्टि
चुराई । अन्यसंभोगदुःखिता प्रियाकी सखीका वचन सखीसे।
आभिता अलंकार ॥ ११९ ॥
हठंहितकरप्रीतमलियो, कियो जु सौति शृंगार ॥
अपनेकर मोतिन गह्यो, भयो हराहरहार॥१२०॥
हठ और प्रीतिकरके जो प्यारेने हार लिया उससे सौति-
नका शृंगार किया, अपने हाथके मोतियोंका गुँथा हार सौ-
तिनके गलेमें देख वह हार महादेवजीके हार ( सर्पहार ) सा
हुआ । व्याघातालंकार [ दोहा-सुखद दुखद होजाय जो
द्वितीयशतक २. (४५)
सो कहिये व्याघात । अपनो गूँथो हारभो, दुखद महा अन-
खात ] ॥ १२० ॥
सुरँग महावर सौतिपग, निरखरही अनखाय ॥
पियअँगुरिनलाली लखै,खरीउठी लगिजाय १२१
सुंदर अथवा लालरंग महावर सौतिके पांयमें देख प्यारी
महा क्रोधकर स्थितहुई, कारण कि, जो यह मुझे भावैहै तो
प्रीतमकोभी भावैगी, परन्तु जब प्रीतमकी अँगुलियोंमें महा-
वरकी लाली देखी तब तो अधिक आग लगउठी, । अनुगुण
अलंकार ॥ १२१ ॥
स्वकीया स्वाधीनपतिका वर्णन ।
रहो गुणी वेणी लखे, गुहिवेको त्यों नार ।
लागे नीर चुचावने,नीठ सुखाये वार ॥१२२॥
रहनेदो तुमने चोटी गूँथदी और तुम्हारे गूँथनेकी चतुराई
भी देखली, जो बाल हमने निचोडकर सुखायेथे वह पानीसे
चुचाने लगे आशय यह कि,दोनोंको स्पर्शसे सात्विक हुआ ।
परिवृत्तालंकार [ दोहा-परिवृत्त कीजै और कछु, और कछु
बनजाय।गुहिवेको कारज लग्यो, करने नीर चुवाय ] ॥१२२॥
प्रिय प्राणनिकी पाहरू, यत्नकरति नित आप ।
जाकी दुसह दशाभये, मोतिनहू संताप ॥ १२३ ॥
( ४६ ) सतसई-सटीक ।
यह अपने प्रीतमके प्राणोंकी पाहरूहै इसकारण इसके
प्रिय स्वयं सदा इसका यत्न करते हैं, जिसकी दुस्सह दशा देख
कर सौतोंकोभी दुःख हुआ आशय यह कि, इसके प्राण जायँगे
तो प्यारेकाभी मरण होगा। सम्बन्धातिशयोक्ति ॥ १२३ ॥
टुनहाई सब टोलमें, रही जु सौति कहाय !
सुतौ ऐंचिपियआपत्यौं, करीअदोषिलआय १२४
जो टोना करनेवाली सब सखियोंके समूहमें तेरी सौति
बाजरहीथी, सो तैने नायकको वशकर वह सौत बेछूत करदी
लेखांलकार, जो सौतोंका वशीभूत करना कर्म दोषमयथा
टोनाके पदसे वह गुण हुआ, जैसे टुट कहेरी भूतकी छूत दूर-
करै तैसे इसने सौतसे दूरकर निज वशकिया ॥ १२४ ॥
स्वकीया प्रोषितपतिका।
रह्यो ऐंच अन्त न लह्यो, अवधि दुशासनवीर ।
आली वाढति विरह ज्यों, पंचालीको चीर ॥ १२५॥
खैंचरहा है परन्तु अवधिरूप दुःशासनवीरने उसका अन्त
न पाया, हे सखी ! द्रौपदीके चीरके समान मेरा विरह बढता
जाताहै। पूर्णोपमा ॥ १२५ ॥
हिय औरैसी होगई, टरे अवधिके नाम ।
दूजे करि डारी खरी, बौरी बौरे आम ॥ १२६ ॥
द्वितीयशतक २. (१७)
अवधिके नाम टलनेसे प्यारी मनमें ओरहीसी होगई और
दूसरे बौरे अर्थात् मौले हुए आमने तो उसे बावलीही करडा-
ला। भेदकातिशयोक्ति ॥ १२६ ॥
छप्यो नेह कागज हिये, भई लखाइ न टांक ।
विरहतचे उघऱ्योसु अब, सैहुँडकोसोआँक १२७
जो कागजरूपी प्रीति निर्मल मनमें छिपी थी और थोडी
भी प्रसिद्ध न हुई सो अब थूहरके दूधके लिखे अक्षरसी
विरहकी आगसे सिककर खुली। पूणो और गलोभांर आया
अक्षर आगपर सेकनेसे चमकते हैं ॥ प्र अलंकार ॥१२७॥
चित तरसत मिलत न बनत, वसाणेश ।
छाती फाटत जात सुनि, टाटी ओटविदेश १२८
मन तरसताहै परन्तु पडोसके घरमेंमिनी इन साधा-
नहीं बनता। टट्टीकी ओटमें लम्बी साँसों जो वर्षाकालमें
जातीहै नायकका वचन सखीसे विशेषो॥ १२८ ॥
रहि हैं चंचल प्राण यह, कहि भनअथ्यौभान।
ललनचलनकीचितधरी, करत मलान ॥ १२६ ॥
सखी अब यह मेरे चंचल प्राण हाथ पकड़ नटने
प्यारेने तो चलनेकी चित्तमें धरी है त होगया दो घडी
ओट होनेसे कल नहीं पड़तीहै, मग..
(४८) सतसई-सटीक ।
अजौं न आये सहज रँग, विरह दूबरे गात ।
अबहीं कहा चलाइयत, ललन चलनकी बात ॥ १३० ॥
जो सहजके रंगथे वह विरहके दुबले शरीरमें अभीतक
नहीं आये. फिर हे कृष्ण ! अभीसे क्या चलनेकी बातचलाते
हो अधैर्याक्षेपालंकार ॥ १३० ॥
पूसमास सुनि सखिनिपै, साईं चलत सवार ।
--गहि कर वीणा पाणि तिय, रोप्यो राग मलार १३१
बाजरहीथी, सो तैने -
लेखांलंकार, जो सौतों योंसे यह वचन सुनकर किं, प्यारे प्रातः-
टोनाके पदसे वह गु लगे, वीणा हाथमेंले नागरीने राग मलार
करै तैसे इसने सौ- यह कि, पूस महीनेके मेघसे अकाल वृष्टि
न नहीं। उपायाक्षेपालंकार ॥ १३१ ॥
रह्यो ऐंच अन्त ने पलनमें, अँसुआ झलके आय।
आली बाढत विर खिन हूं, झूठेही जमुहाय ॥ १३२ ॥
खैंचरहा है परन्तु नतेही पलकोंमें आँसू आ झलके सखियों
न पाया, हे सखी ! द्रोपै, कारण कि, झूठेही जँभाई लेनेलगी ।
जाताहै। पूर्णोपमा ॥ १२
हिय औरैसी होगई, ले, सबसुख संग लगाय ॥
दूजे करि डारी खरीर निशि, पिय मोपास बसाय ॥
द्वितीयशतक २. (४९)
चलते २ प्यारे हमारे सब सुख अपने साथ लेचले केव-
ल गरमीके दिन और शिशिर ऋतुकी रात हमारे साथको
बसा चले, अथवा ग्रीष्मके दिनके समान शिशिरकी रात
हमारे निकट छोड़ चले । लुप्तोत्प्रेक्षालंकार ॥ १३३ ॥
विलखी डबकोहैं चखन,तिय लखि गमन वराय ।
पिय गहवर आयो गरो,राखी गरे लगाय ॥१३४॥
प्यारेके जानेमें व्याकुलहो जब आंखें डबकाने लगीं तब
यह देख प्रीतमने अपना जाना टालदिया,और गलाभरि आया
प्यारीको गलेसे लगा रक्खा । लाटानुप्रास अलंकार ॥१३४॥
वामा भामा कामिनी, कहि बोलो प्राणेश ।
प्यारी कहत लजात नहिं, पावस चलत विदेश॥१३५
हे प्राणपति ! आप मुझे वामा भामा कामिनी इन साधा-
रण नामोंसे पुकारो, प्यारी कहते लजाते नहीं जो वर्षाकालमें
मुझे छोड़ विदेश जातेहो । विचित्रांलंकार ॥ १३५ ॥
मिलचलि चलिमिल मिलचलत, आँगन अथयो भान।
भयो मुहूरत भोरतें, पौरी प्रथम मिलान ॥१३६॥
मिलकर चलते चलकर मिलते फिर हाथ पकड़ चलते
इसप्रकार आँगनके मध्यहीमें सूर्य अस्त होगया दो घडी
( ५० ) सतसई-सटीक ।
प्रातःकालके मुहूर्त्तसे ड्योढीमेंही प्रथम प्रस्थान (डेरा) हुआ
लाटानुप्रास ॥ १३६ ॥
चाहभरी अति रिसभरी, विरहभरी सब बात ॥
कोरि संदेशे दुहुँनके, चले पौरिलौं जात ॥ १३७॥
चाहभरी क्रोधभरी और रिसभरी सब बातें हैं घरसे
ड्योढीतक जानेमें दोनोंके करोड़ संदेशे चले । लाटानुप्रास
अलंकार ॥ १३७ ॥
नये विरह बढती विथा, भई विकल जिय बाल ।
दुखी देख परोसिन्यों, हरषि हँसी तिहि काल १३८
नये विरहकी बढती पीडासे बाल मनमें बहुत व्याकुल
हुई और परोसिनको व्याकुल हुई देखकर उसीसमय हँसपड़ी
आशय यह कि, अपने प्रीतमके गमनमें सौतको दुःखी देख
हँसी । अनुमानालंकार ॥ १३८ ॥
चलत देत आभार सुनि, वही परोसिनि नाह ।
लसी तमासेके दृगन, हांसी आँसुनि माँह ॥ १३९
प्रवत्सत्पतिका और मुदिता, चलते समय उसी परो-
सिनके पतिको घरका भार सौंपता सुनकर आंसूभरे चंचल
नयनोंमें हँसी शोभायमान हुई । प्रहर्षणा और पर्याया-
लंकार ॥ १३९ ॥
द्वितीयशतक २. ( ५१ )
भये बटाऊ नेह तज, वाद वकति बेकाज ।
अब अलि देत उराहनो, उर उपर्जति अतिलाज
हे सखी ! यह तो प्रीति छोड़कर वटोही पथिक होगये तू
विना काज क्यों वकतीहै हे सखी। अब तो उराहना देत मनमें
बहुत लाज उपजतीहै आशय यह कि, स्नेहत्यागी और बटा-
ऊको उराहने देनेमें लाज आतीहै । काव्यलिंगआक्षेपालं-
कार ॥ १४० ॥
स्वकीया आगमलक्षितावर्णन ।
मृगनयनी दृगकी फरक, उर उछाह तनु फूल ।
बिनहीँपियआगम उमँगि, पलटनलगीदुकूल १४१
मृगलोचनीकी वाईँ आँख फड़कतेही उछाहसे शरीर फूल
गया,और विनाही प्रीतमके आगमनके प्रसन्नतासे अपना ओ-
ढना बदलने लगी अर्थात् नया पहरने लगी। अनुमान॥ १४१॥
वामबाहु फरकति मिलैं, जो हरि जीवनमूरि ।
तो तोहीसों भेंटिहौं, राखि दाहिनी दूरि ॥१४२॥
हे बाईं भुजा ! तेरे फड़कनेसे जो मेरे जीवनमूल कृष्ण
मिलजायँ तो दाहिनीभुजाको दूर रखकर तुझहींस आलिंगन
करूंगी । संभावना जोयों आदिपदसे ॥ १४२ ॥
( ५२ ) सतसई-सटीक ।
मलिन देह वेई वसन, मलिन विरहके रूप ।
पिय आगम औरै बढ़ी, आनन ओप अनूप १४३
मैली देह और वेई मलीन वस्त्र विरहके रूपमें हैं, परन्तु
प्रीतमके आगमनसे मुखपर अनूप ज्योति बढ़ी। भेदकांति-
शयोक्ति ॥ १४३ ॥
कियो सयानी सखिनसों, नहिं सयान यह भूल ।
दुरै दुराई फूललों, क्यों पिय आगम फूल ॥ १४४॥
हे आली ! तैने जो सखियोंसे यह चतुराईकी सो यह
तेरी भूल है, प्यारेकी आगमनकी प्रफुल्लता फूलकी सुगंधि
के समान छिपाये नहीं छिपती । पूर्णोपमा ॥ १४४ ॥
रहे बरोठेमें मिलत, पिय प्राणनके ईश ।
आवत आवतकी भई, विधिकी घरी घरीश १४५
द्वारके बाहर जो प्राणनाथ स्नेही जनोंसे मिलने लगे तो
वह आते आतेकी घड़ी प्यारीको ब्रह्माकी घड़ीके समान
हुई । धर्मवाचकलुप्तालंकार ॥ १४५ ॥
भेंटत बनत न भावतो, चित तरसत अतिप्यार ।
धरति उठाय लगाय उर, भूषण वसन हथ्यार ॥
ससुरालमें प्यारेसे मिलनातो बनता नहीं और प्यारसे
चित्त तरसता है, इसकारण उनके भूषण वसन हथियार उठाकर