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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

( ४० ) सतसई-सटीक ।
तोहीको छुट मानगो, देखतही ब्रजराज ।
रही घरिकलों मानसी,मानकियेकी लाज १०७॥
श्रीकृष्णके देखतेही तेरे मनका मान तो छुटके गया,
परन्तु मानकियेकी लाजसे एकघडीतक तो तू मानको माने
रही घडी एक मानकी सीमा न शोभा स्थित रही । कर-
माल ॥ १०७ ॥
कियोजु चिबुक उठाय करि,कंपत कर भरतार ।
टेढीयहटेढीफिरति,टेढेतिलक लिलार ॥ १०८॥
ठोढी उठाकर जो कंपितहाथसे भर्त्ताने प्रियाके माथेपर
तिलक किया, तो स माथेके टेढे तिलकसे यह टेढी हुई
फिरतीहै कि, मुझसे अधिक कोई न्दर नहीं,प्यारीको देख
जो सात्त्विकभाव आ इससे हाथ कांपनेसे टेढातिलक हुआ।
पंचम विभावना ॥ १०८ ॥
तुम सौतिन देखत दई, अपने हियते लाल ।
फिरतिसबनमें डहडही,उहै मरगजीमाल॥१०९॥
सखी वचन हे प्यारे ! सौतोंके देखते जो तुमने अपने हृदय
की माला उसे दी तबसे वह उस मुरझाई हुई मालाको
लिये सबमें डहडही ( हरीभरी ) फिरती है । पंचम विभा-
वना ॥ १०९ ॥