बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) सतसई-सटीक ।
कह क्यों प्रगटे देखियत, पुलकि पसीजे गात ८९
अरी यह वसन्तरुतुहै, इसमें न बहुत गरम और न बहुत
ठंढी पवनहै, परन्तु यह तो कह कि, तेरे अंगमें पसीजे हुए
रोमांच क्यों दीखते हैं, । प्रथम विभावना ॥ ८९ ॥
मेरे बूझे बात त, कत बहरावति बाल ।
जगजानी विपरीतरति, लखिबिंदुलीपियभाल ९०
हे बाले ! मेरे बूझनेसे क्यों बात बहराती है, प्रीतमके माथे
पर बिन्दी देखकर तेरी विपरीत रति सबने जानली । अनु-
मान ॥ ९० ॥
सुदुतिदुराईदुरतिनहिं, प्रगटकरतिरतिरूप ।
छुटे पीकऔरै उठी, लालीओठअनूप॥९१॥
हे सुदुति ! सुन्दर दांतवाली तेरी अच्छी शोभा छिपाई
नहीं छिपती, कामकेलिका रूप प्रगट करती है, पीक छूटके
होठमें और भी नई लाली खुली कि, जिसकी उपमा नहीं
है, पीक छूटनेका कारण यह कि, सब रंग प्रीतमके अधरोंने
लेलियाहै, और उसके दुरानेका कारण यह कि, यह स्त्री पर-
कीयाहै, इसकारण स्वामी आनकर पूछे कि, पान कहां खाया
तब उत्तर न बनेगा । भेदकांतिशयोक्ति ॥ ९१ ॥
रँगीसुरतिरँग पियहिये, लगी जगी सबराति ।