सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

( ३८ ) सतसई-सटीक ।
मोहिं लजावत निलज यह, हुलसि मिलैं सबगात।
भानु उदयकी ओसलों, माननजान्योजात १०१
यह निर्लज्ज नेत्र मुझे लजाते हैं और आप प्रसन्न हो प्यारे
के सब शरीरसे मिले हैं जैसे सूर्य उदयहोनेपर ओस गई नहीं
जानी जाती । इसीप्रकार उनके दर्शनसे मान गया हुआ नहीं
जानाजाता । पूर्णोपमा ॥ १०१ ॥
खिचे मान अपराधते, चलिगे बढे अचैन ।
जुरत दीठितजिरिसखिसी, हँसेदुँहुनके नैन १०२
हे सखी ! पहले तो प्यारीके मानसे प्यारेके अपराध करने
के कारण नेत्ररुके, पीछे परस्पर न देखनेके( अचैन ) दुःखसे
चलायमान होगये, हे सखी! दृष्टिके जुरतेही रिसत्याग दोनोंके
नेत्र हँसपडे । प्रहर्ष अलंकार [ दोहा-काज सफल जहँ यत्न
बिन, कहत प्रहर्षणताहि । यत्नबिना प्यारी मनी, है प्रसन्न
चितचाहि ] ॥ १०२ ॥
रात दिवस हौंसै रहैं, मान न टिक ठहराय ।
जेतो अवगुण ढूँढिये, गुणौ हाथपरिजाय॥ १०३॥
हे सखी ! हमें रात दिन इसी बातकी हौंस रहै है कि, प्यारे
से मान कराकर देखें परन्तु मान ठीक नहीं ठहरता प्यारेका