बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमशतक १. ( ३५ )
पैंडपैंडपरठकिकै, ऐंडभरी ऐंडाति ॥ ९२ ॥
कामकेलिमें रँगकर पियाकी छातीसे लग यह सारी रात
जागीहै, इससे पग पग पर खडी होकर गर्वभरी ऐंडाती है
स्वभावोक्ति ॥ ९२ ॥
तरवन कनक कपोल दुति, बिचही बीच बिकान।
लाल लाल चमकतिचुनी, चौकाचिह्न समान ९३
जड़ाऊ सोनेकी बनी ढेरीका सोना कपोलकी कांतिहीमें
मिलगया लाल लाल चुन्नी दाँतके चौकेके समान चमकती है
पूर्णोपमा ॥ ९३ ॥
पटको ढिग कत ढापियत, शोभित सुभग सुभेष ।
हदरदछदछबि देखियत,सदरदछदकीरेष॥९४॥
इसे घूंघटपटके निकट क्यों ढकतीहो, यह तो सुन्दररस
स्वरूपसे शोभा देती है तुरतके दांतोंके घावकी लकीर हद
भर होठोंकी शोभामें दिखाई देती है । विभावना और
वृत्यनुप्रास ॥ ९४ ॥
कहि पठई मनभावती, पिय आवनकी बात ।
फूली आँगनमें फिरै, आँगन आँग समात॥९५॥
जिस समय प्यारेने प्यारीके मनकी चाही अपन आवनकी