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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

( ३६ ) सतसई-सटीक ।
बात कहकर भेजी उससे प्रसन्नहो आँगनमें फिरने लगी श-
रीरमें शरीर नहीं समाता । लोकोक्ति ॥ ९५ ॥
फिरिफिरिविलखीहैलखति, फिरिफिरिलेतिउसास।
साईंसिरकचसेतलौं, बीत्यो चुनत कपास ॥ ९६ ॥
बारबार अनमनीहो देखती है, और बार २ ऊँची सांस
लेती है, स्वामीके शिरके श्वेतबालोंके समान बीतीहुई क-
पास चुनती है, अनुशयना अपने क्रीडाके स्थान कपासके
खेत नष्ट होनेपर शोच करतीहै, अथवा कपासके खेतमें सं-
केत स्थान था उसके नष्ट होनेसे दुःख हुआ। पूर्णोपमा दृष्टा-
न्तालंकार ॥ ९६ ॥
सनसूख्योबीत्योबनों, ऊखौ लई उखारि ।
अरीहरीअरहरअजौं, धर धर हर हिय नारि॥९७॥
सन सूखगई कपासका बन बीत गया, गन्ने उखाड़ लिये
हे आली! अभी अरहर हरीहै, मनमें धीरज रख, आशय यह
कि, तू इन वस्तुओंके निबट जानेसे अभी शोच मतकरै यह
अरहरका खेत अभी अच्छा संकेत स्थानहै, वीप्सा छेकानु-
प्रास “हरी २ वीप्सा” ॥ ९७ ॥
सतर भौंह रूखे वचन, करति कठिन मन नीठि।
कहाकरौं हैजाति हरि, होरि हँसोही दीठि ॥९८॥