बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. (४१)
क्षणक उघारतिक्षणछुवति,राखतिक्षणकछिपाय।
सबदिनपियखंडितअधर,दर्पणदेखतजाय ११०
क्षणमें उघारती क्षणमें छूती और क्षणमें छिपारखती है
सब दिन प्यारेके खंडित अधर दर्पणमें देखती जाती है, ।
जाति अलंकार लाटानुप्रास ॥ ११० ॥
छाला छबीले छैलकों, नवल नेह लहि नारि ।
चूमति चाहति लाय उर, पहरति धरति उतारि १११
प्यारी स्त्री छबीले लालके नये नेहमें उसके दिये छल्लेको
पाकर चूमती है हृदय लगाय देखती है पहरती है उता-
र धरती है । प्रेमजातालंकार परकीया प्रेमगर्विता वर्णन
हुआ ॥ १११ ॥
स्वकीया रूपगर्वितावर्णन ।
दुसहसौति शल्य जुहिय,गनति न नाह विवाह ।
धरेरूपगुणकोगरव,फिरै अछेह उछाह ॥११२॥
हे सखी । सौतनोंका दुस्सह खटका सबके मनमें होताहै
परन्तु यह नायकके विवाहको कुछ नहीं गिनती; अपने
रूप और गुणका गर्व धारणकिये अनन्त आनंदसे फिरती है,
अर्थात् इसने समझरक्खाहै कि, आजतक तो यह मेरी पर-
ख नहीं जानते थे, अब दूसरेके आनेसे जब वे बातें उसमें न
देखेंगे तब मुझे अधिक जानेंगे । पंचमविभावना ॥ ११२ ॥