बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमशतक १. ( ३७ )
सखीने प्यारीसे मान करनेको कहा तब उसने कहा आली
टेढी भौंहें कर रूखे वचन कहतीहूं और नीठ-( कठिनाई )
कर कड़ा मन भी करा पंरतु क्या करूं कृष्णके देखतेही
मेरी दृष्टि हँसौही होजाती है । तृतीय विभावना ॥ ९८ ॥
तूहुं कहति हौं आपहू, समझति बहुत सयान ।
लखिमोहन जो मनरहै, तो मनराखोंमान॥९९॥
तू भी कहती है और आपभी मैं बहुत चतुराई समझूँ हूं
परन्तु मोहनको देखकर जो मन मेरे पास रहे; तो मनमें मा-
नराखसकूं आशय यह कि, उन्हें देखतेही मन हाथसे निकल
जाय है फिर मान कहांसे होय । विशेषोक्ति सम्भावना॥९९॥
दहैं निगोडे नैन यह, गहैं न चेत अचेत ।
हौंकसिकै रिसकोकरौं;यहनिरखेहँसिदेत ॥१००॥
हे सखी ! यह मेरी निगोड़ी आँखें जरें ऐसी अचेत हैं कि,
चेत पकड़तीही नहीं मैं हठकर मानको करतीहूं परन्तु यह
कृष्णको देखतेही हँसदेते हैं । विभावना । हँसनेसे रिसनहीं
रहती ॥ १०० ॥
इति कविवर बिहारीलालकी सतसईमें पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत
भावप्रकाशिकाटीकासहित प्रथमशतक पूर्ण हुआ ॥ १ ॥