बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. ( ३९ )
जितना अवगुण ढूँढती हूं उतना गुणही हाथमें पड़जाताहै ।
विशेषोक्ति ॥ १०३ ॥
जौलौं लखों न कुलकथा, तौलौं ठिक ठहराय ।
देखे आवत देखबो, क्योंहूं रह्यो न जाय ॥ १०४ ॥
हे सखी ! जबतक घनश्यामको नहीं देखती तवहींतक
कुलकानकी कथा ठीक ठहरती है, उन्हें देखनेसे तो मनमें
देखनाहीं आताहै किसी प्रकारभी रहा नहीं जाता । संभा-
वना ॥ १०४ ॥
कपट सतर भौंहैं करी, मुख सतरौहैं वैन ।
सहजहँसौ हैं जानकर, सौ हैं करति न नैन ॥ १०५॥
हे सखी! हमारे कहनेसे प्यारीने मान किया सो तुम देखो
कपटसे टेढी भौंहैं करी मुखसे क्रोधभरी बातें कहीं परन्तु
स्वभावसे हँसनेवाली जानकर प्यारेके सन्मुख अपनी आँ-
खोंको नहीं करती । छेकानुप्रासयमकालंकार ॥ १०५ ॥
नहिंनचायचितवतिदृगनि, नहिं बोलति मुसकाय।
ज्यों २ रुखरुखोकरति, त्यों २ चितचिकनाय १०६
आँखोंको नचाकर नहीं देखती, मुसकाकर नहीं बोलती,
ज्यों २ रुखरुखोकरतीहै त्यों २ चित्त चिकनाहोता जाता है।
विभावना ॥ १०६ ॥