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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

(४२) सतसई-सटीक ।
सुघर सौतिवश पिय सुनत,दुलहिनदुगुणहुलास ।
लखीसखीतनुदीठिकर,सगरबसलजसहास १ १३
हे सखी ! प्यारेको चतुर सौतिके वश सुनकर दुलहिनको
दूना हुलास हुआ, इसकारण गर्व लाज और हासके सहित
सखीकी ओर दृष्टि करके देखा, आशय यह कि, एक तो
अपना रूप गुण अधिक जानती थी, दूसरे यह कि,जो सुन्दर
के वशीहुए हैं तो मैं भी सुन्दर हूँ मेरे वशमें होंगे, वह चार
दिनकी आई क्या चतुराई करसके है, इसकारण उसे तुच्छ
जान अपनी सखीको देखा । विभावना ॥ ११३॥
हँसि ओठनि बिच कर उच्चै, किये निचो हैं नैन ।
खरे अरे पियके प्रिया, लगी बिरी मुख दैन ११४
होठोंहीके बीच हँसकर हाथ ऊँचाकर निचोहे नैनकिये
प्यारेके अधिक हठ करनेसे प्यारी मुखमें बीरी देने लगी कोई
बीरीका अर्थ रंगनेकी बीरी करते हैं।जातिअलंकार॥११४॥
विथुज्यो जावक सौतिपग,निरख हसी गहि गास ।
सलज हँसौहीं लखिलियो,आधीहँसीउसास ११५
सौतिके पगमें जावक (महावर) बिखरा देखकर ईर्षासे
वह हँसी-लाजसे सौतको हँसती हुई देखकर आधी हँसीमें
प्रियाने ठंढी श्वास ली, अर्थात् पहले तो उसे मूर्खही जाना