बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
( २१० ) सतसई-सटीक ।
हाथमें ले सूंघ कर सराहना कर सब गँवार मौन होरहे
हे गन्धी!गुलाबकी गन्धका गाँवमें कौन ग्राहक है जो मोल ले
ऐसाही गुणीका मूर्खोमें गुण प्रकाश करना है "अन्यो०"६४५
करि फुलेलको आचमन, मीठो कहति सराहि ।
चुपकरि रहु गंधी चतुर,अतरदिखावतकाहि६४६
ग्रामीण फुलेलका आचमन कर सराहना कर मीठा कहने
लगे, हेचतुर गंधी! चुपकर, अतर किसको दिखाता है मूर्खोंके
आगे चतुरकी विडम्बनामें उक्ति ॥ ६४६ ॥
कनक कनकते सौगुणी, मादकता अधिकाय।
उहि खावे बौराय जग, यह पाये बौराय॥६४७॥
( कनक ) धतूरेसे ( कनक ) सोनेमें सौगुणी मादकता
अधिक है वह खानेसे बौरा होता है परन्तु सुवर्णके पातेही
जग बौराजाता है “व्यतिरेकालंकार” ॥ ६४७ ॥
बड़े न हूजे गुणन बिन, बिरद बड़ाई पाय ।
कहत धतूरेसों कनक,गहने गढो न जाय॥६४८॥
गुणके विना यश बड़ाई पाकर बड़ाहोना उचित नहीं
धतूरेकोभी कनक ( सोना ) कहते हैं परन्तु वह गहनेमें नहीं
गढाजाता है “अन्तरन्यास” ॥ ६४८ ॥
सप्तमशतक ७. ( २११ )
हास्यरसवर्णन ।
रवि वन्दो कर जोरकै, सुनत श्यामके वैन ।
भये हँसोहे सबनिके, अति अनखोहे नैन॥६४९॥
जिससमय गोपियें चीरहरणके समय हाथसे अंग छिपाय
जलसे बाहरहुईं तब कृष्णने कहा हाथ जोड़ सूर्यको प्रणाम
करो यह सुनकर बालाओंके क्रोधभरे नेत्रोंमें हँसी आगई
"पर्यायालंकार" ॥ ६४९ ॥
कण देव्यो सौंप्यो ससुर, बहू थुरहथी जानि ।
रूप रहिचटै लगिलग्यो, मांगन सब जग आनि ॥
ससुरने बहूको छोटे हाथकी जानकर अन्न देना सौंपा उस-
के रूपके लालचसे सब जगतके लोग आकर मांगनेलगे
"विषादालंकार" अन्न थोडा उठेगा इसकारण काम
सौंपा सो उसके विरुद्ध अधिक उठनेलगा इससे विषाद
हुआ ॥ ६५० ॥
परतिय दोष पुराण सुनि, हँस मुलकी मुखदानि ।
कसकरि राखी मिश्रहू, मुँह आई मुसकानि॥६५१॥
पुराणमें परस्त्रियोंके गमनका दोष सुनकर सुखदायक थो-
ड़ा मुसकाकर हँसी तथा मिश्र ( पुराणवक्ता ) नेभी मुखआई
मुस्कान दबाकर रक्खी "अनुमान" ॥ ६५१ ॥
( २१२ ) सतसई-सटीक ।
चित पितुघातक योग लखि, भयो भये सुत सोग।
फिर हुलसो जिय जोतसी, समझो जारज योग ॥
पुत्र होनेपर पितुघातक योग देखकर ज्योतिषीको पुत्रके
होनेका शोक हुआ फिर जारजयोग जानकर प्रसन्नहुए आशय
यह कि, यह जारसे उत्पन्नहै ऐसा होनेसे जारका घातकहै इ-
सकारण प्रसन्न हुए “लेखांलंकार ॥ ६५२ ॥
बहुधन लै अहसानकें, पारो देति सराहि ।
वैदवधू हँसि भेदसों, रही नाह मुखचाहि ॥६५३॥
वैद्य बहुतसा धनले अहसानकर सराहना करके दूसरोंको
पारादेताहै, परन्तु इस बातसे हँसकर वैद्यकी स्त्री भेदसे स्वा-
मीका मुख देखकररही “अनुमानालंकार” हँसनेसे वैद्यमें न-
पुंसकताका अनुमान है ॥ ६५३ ॥
गोपनके अँसुअनभरी, सदा असोत अपार ।
डगर डगरने ह्वैरही, बगरबगरके बार ॥ ६५४ ॥
उद्धवजीका वचन श्रीकृष्णसे गोपियोंके आंसुओंसे भरी
विनाही सोतेवाली नसूखनेवाली अपारनदी ब्रजकी गली
गलीमें नहीं किन्तु घर घरके बाहर होरहीहै “अत्युक्ता-
लंकार” ॥ ६५४ ॥
श्याम सुरतिकर राधिका, तकत तरणिजा तीर ।
सप्तमशतक ७. (२३३)
अँसुवनि करति तरोसके, क्षणक खरोहे नीर ॥
हे कृष्ण ! तुम्हारी सुरतकर राधिका यमुनाके तटको ता-
कती है आँसुओंसे क्षणमात्रमें तरोसके जलको खारि करदे-
तीहै तरोस-तलछट, "उल्हासालंकार" खरोह-खारी अथवा
गुनगुना, करोह पाठमें आंसुओंसे मिलनेसे काला ॥ ६५५ ॥
लोपे कोपे इन्द्रलौं, रोपे प्रलय अकाल ।
गिरिधारी राखेसबै, गो गोपी गोपाल ॥६५६ ॥
हे उद्धवजी ! जिससमय कृष्णने इन्द्रका यज्ञ लोपा तब
उसने कोपकर अकालप्रलय ( रोपा ) करनी चाही उससमय
गिरि धारण करके सब गो गोपी गोपालकी रक्षा कीथी "प-
रिकरांकुरवृत्त्यनुप्रासालंकार," [ दो०-अभिप्रायके सहित
जहाँ,हो विशेष्य सुखदान । परिकरांकुर तेहि कहत, कविजन
परमसुजान ॥ ६५६ ॥
हौं हारी कैकै हहा, पाँइन पारो प्यौर ।
लेह कहा अजहूँ किये, तेहतररे त्यौर ॥ ६५७ ॥
हम सब हाहाखाय समझा २ वा कह कह कर हारगई तथा
प्रीतमको पाँवमें डाला इससे तू क्या लेगी जो अब भी
क्रोधमें बड़ी २ आँखें कर देखती है "विशेषोक्ति" ॥६५७॥
अनी बडी उमडत लखै, अभिवादक भटभूप ।
( २१४ ) सतसई-सटीक ।
मंगल कारि मान्यो हिये, भोमुख मंगलरूप॥६५८
शत्रुका कटक बड़ा चारों ओरसे उमड़ा देखकर खड्ग-
धारी वीर राजा ( जयसाह ) ने उसे मनमें मंगल करके माना
और मुख मंगलरूप ( लालवर्ण ) हुआ । मंगलका लालव-
र्ण है “विभावना” ॥ ६५८ ॥
नाह गरज नाहर गरज, वचन सुनायो टेरि ।
फँसीफौज बिच बन्दिमें, हँसी सबानिमुखहेरि६५९
रुक्मिणीहरणका समय, मत्तसिंहकी गरजसे गरजे और
सबको पुकारकर यह वचन सुनाया, विरोधियोंकी सेनाकी
बांदिमें फँसी, और सब राक्षसोंका मुख देख हँसी ॥ ६५९ ॥
डिगतपानि डिगलातगिरि, लखि सब ब्रज बेहाल।
कम्प किशोरीदरशते, खरे लजाने लाल ॥६६०॥
हाथके हलनेसे गोवर्द्धनपर्वतभी हिलता है यह देखकर
सब ब्रज बेहाल होगया, राधिकाको देखकर (सात्त्विकहोनेसे)
कम्प हुआ इसकारण स्वयं लाल ( कृष्ण ) लजाये आशय
यह कि, ब्रजवासी न जानें कि, राधिकाकी प्रीति है
“हेतुअलंकार” ॥ ६६० ॥
प्रलयकरन बरसनलगे, जुरि जलधर इकसाथ ।
सुरपति गर्व हरो हरषि, गिरिधर गिरिधर हाथ ॥
सप्तमशतक ७. ( २१५ )
जिससमय सब मेघ एकसाथ जुरकर वर्षा करने लगे
उस गिरधारीने प्रसन्नहो हाथपर पर्वत धारणकर इन्द्रका
गर्व हरण किया "काव्यलिंग" ॥ ६६१ ॥
यों दल काढे बलखते, तैं जयसाह भुआल ।
उदर अघासुरके परे, ज्यों हरि गाय गुवाल६६२
जिस समय जयशाहकी सेना बलखपर चढकर ऐसी घिरी
कि, कहीं मार्ग दिखाई नहीं देताथा तब कौशलसे जयशाहने
निकाली उसपर कहते हैं हे जयशाह ! तैने बलखबुखारके
घेरेमेंसे इसप्रकार अपनी सेना निकाली कि, जैसे अघासुरके
उदरसे कृष्णने गाय ग्वाल निकालेथे"दृष्टान्तालंकार" ६६२
मोहनि मूरति श्यामकी, अति अद्भुत गति जोय।
बसत सुचित अंतर तऊ, प्रतिबिंबित जग होय ॥
श्यामकी मनमोहनी मूर्त्तिकी अद्भुत गति तो देखो कि,
चित्तके अन्तरमें निवास करती है और छाया संसारमें दृष्टि
आती है मलीन जगतमें भी ब्रह्मनिष्ठको श्यामका प्रतिबिंब
दीखता है यह अद्भुतगति है अद्भुत सुविचार " विशेष
अलंकार ॥ ६६३ ॥
या अनुरागी चित्तकी, गति समझे नहिं कोय ।
ज्यों ज्यों बूड़े स्यामरँग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय॥
( २१६ ) सतसई-सटीक ।
इस प्रेमवाले चित्तकी गति कोई नहीं समझता है कि,
ज्यों ज्यों श्यामरंगमें डूबता है त्यों त्यों निर्मल होता है अ-
र्थात् श्रृंगारमय होता है "विषमालंकार संभावना" ॥६६४॥
सोरठा ।
मैं समझो निरधार, यह जग काचो काँचसों ।
एकैरूप अपार, प्रतिबिंबित लखियत जहां ६६५
मैंने विचारकर देखलिया, यह जगत् कच्चा कांचसा है
जिसमें परमात्माके एकरूपके अनन्त प्रतिबिम्ब देखे जाते
हैं "पूर्णोपमा" ॥ ६६५ ॥
दो०-कोऊ कोटिक संग्रहौ, कोऊ लाख हजार ।
मो संपति यदुपति सदा,विपति विदारनहार६६६
कोई करोड कोई लाख हजार द्रव्यका संग्रह करो परन्तु
मेरी सम्पत्तितो विपत्ति विदारणहार सदा यदुपतिही हैं
"व्यतिरेक" ॥ ६६६ ॥
यमकरि मुँहतरहरपरचो, यह धरहर चितलाय ।
विषयतृषापरिहरिअजौं, नरहरिकेगुणगाय ६६७
यमरूपी हाथी नीचा मुख किये तले पड़ा है; यह मनमें
धारण कर हरिमें चित्त लगा विषयरूपी तृष्णाको अब भी
छोड़कर नृसिंहजीके गुण गानकर "परिसंख्या" ॥६६७॥
सप्तमशतक ७. (२१७)
जप माला छापा तिलक, सरै न एको काम ॥
मनकाचे नाचे वृथा, साँचे रांचे राम ॥ ६६८ ॥
जप माला छापा तिलक इनसे एक भी काम नहीं निक-
लता है जो मन कच्चाहै तो नाचना वृथा है राम तो साँचेसे मि-
लते हैं अथवा जप माला छापा तिलक करनेसे पुराने क्या
नये का भी काम निकलजाता है, मन कच्चे और वृथाही नाचे
परन्तु राम साँचे ही मिले जप माला छापांस एक अपराधी
की रक्षा हुई थी राजाकी आज्ञा थी मच्छी मत मारना एक
धीमर इस आज्ञाको उल्लंघन कर मच्छी मारने लगा उधरसे
राजाकी सवारी आई तब यह झट टीका लगाय जालके दा-
नोंकी माला फेरने लगा राजा प्रणामकर चला गया “परि-
संख्या” ॥ ६६८ ॥
जगत जनायो जिन सकल, सो हरि जान्योनाहि ॥
ज्यों आंखनजगदेखियै, आंखनदेखिजाहि ६६९
जिन हरिने सब जगत् उपजाया है वे जाननेमें नहीं आते
जैसे आंखसे सब जगत् देखता है परन्तु आंख नहीं देखी-
जाती “दृष्टांत” जनाया-उपजाया चेतन किया॥६६९॥
भजन कह्यो ताते भज्यो, भज्यो न एको बार ।
दर भजन जाते कह्यो, सो तैं भज्यो गंवार॥६७०॥
( २१८ ) सतसई-सटीक ।
हे मन ! भजनकरनेको कहा और तू उससे भाजा एक वा-
रभी उसका भजन न किया, हे गँवार ! जिससे दूर भागना
( विषयसे ) कहा है सो तैने भजन किया "यमक" आशय
यह कि, ईश्वरको न भजा विषयको भजा ॥ ६७० ॥
पतवारी माला पकरि, और न कछू उपाव ।
तरि संसारपयोधिको, हरिनामें करि नाव ॥ ६७१ ॥
पतवाररूपी मालापकड़ और कुछ उपाय नहीं है इसप्रकार
परमात्माके नामकी नावको आश्रयकर संसारसागरके पार
होजा "रूपक" ॥ ६७१ ॥
यह बिरियां नहिं औरकी, तू किरिया वह शोधि ।
पाहननावचढाय जेहि, कीन्होपारपयोधि ॥ ६७२ ॥
यह समय औरका नहीं है हे मन ! तू उस पार उतारनेवाले
की खोजकर जिसने पत्थरपर अपने नामसे रीछ वानरोंको
चढाकर सागर पार करदिया "काव्यलिंग" ॥ ६७२ ॥
दूर भजत प्रभु पीठ दै, गुणविस्तारन काल ।
प्रगटत निर्गुण निकटरहि, चंगरंग भूपाल ॥ ६७३ ॥
गुण विस्तारके समय पीठ देकर दूर भागजाते हैं निर्गुण
के पासही प्रगट होते हैं, प्रभु राजा चंगके समान हैं अथवा चंग
और कलिके राजा की समानता वर्णन की है स्वामीके पाससे
दूर भाजते हैं. अर्थात् डोरा और राजस बढानेके समय दूर
भागते हैं. जिस समय ( डोरा ) गुणा बढायाजाता है चंग दूर
चला जाता है, और स्वामीके निकट निर्गुणता प्रगट करते हैं,
आशय यह कि, डोरा पाकर जैसे चंग दूर जाता है, इसीप्रका-
र रजोगुणकी शक्ति पानेसे राजा प्रभुको भूल जाते हैं, और
जब वह अपना रजोगुणी ऐश्वर्य खेंचलेता है तब दीन दुःखी
हो आठ पहर प्रभुको मनाते हैं, अथवा प्रभुके गुण विस्तार
समय विषय पीठ देकर भागते हैं, तब गुणीकी खोज होती
है, कोई क्षीरसागर और कोई वैकुंठमें खोज करते हैं, जब
निर्गुणब्रह्म कहाजाता है तब व्यापक होनेसे निकटही भास-
ता है आशय यह कि, रज तमकी वृद्धिमें चंगकी भांति प्रभु
से दूर होना है। "श्लेषालंकार" ॥ ६७३ ॥
नटुवालौं प्रभुकर गहै, निगुणी गुण लपटाय ।
वहै गुणी करते छुटै, निगुणीपै ह्वै जाय ॥ ६७४ ॥
लट्टूकी भाँति जब प्रभु हाथमें पकड़ते हैं तब निर्गुणको
गुण लिपटता है वही गुणी हाथसे छूटनेपर निर्गुणी होजाता है
आशय यह कि, जयशाह जिस निर्गुणीको अपने पास रखते
हैं वह गुणी होजाता है और छूटनेपर निर्गुणी होता है जैसे
लट्टू "श्लेषालंकार पूर्णोपमा" ॥ ६७४ ॥
जात जात वित होत है, ज्यों जियमें संतोष ।
(२२०) सतसई-सटीक ।
होत होत जो होय तो, होय घरैंमें मोष ॥६७५॥
धन जातेर मनमें संतोष होता है होतेरभी धन जो संतोष
हो ता घडीमें वा घरही मुक्त होय “विभावना” ॥ ६७५ ॥
ब्रजवासिनको उचित धन, सो धन रुचित न कोय।
सुचित न आयो सुचितई, कहो कहांते होय ६७६
ब्रजवासियोंका उचित धन श्रीकृष्णके प्रेमरूपी धन
किसीके चित्तमें न आया तो पवित्रता और स्थिरता कहांसे
होगी “पर्यायोक्ति व्यावृत्तिदीपकालंकार” ॥ ६७६ ॥
मनमोहनसे मोहकरि, तू घनश्याम सँभारि ।
कुंजविहारीसों विहारि, गिरिधारी उर धारि ६७७॥
हे मानवती ! तू मानसे निर्मोही होरही है मनमोहनसे
मोह (प्रेम) कर इन घनश्याम (काले मेघ) को देखकर
उनको संभार वे इस समय कुंजमें स्थित हैं तू भी कुंजमें चल-
कर उनके साथ विहार कर वे गिरिधारी सबके रक्षक हैं इस
समय तू उनको हृदयसे लगाय धारण कर “पुनरुक्तवदाभा-
सालंकार” [ दो०-अर्थ लखै पुनरुक्तसों, अरु पुनरुक्त न
होय। सो पुनरुक्त्याभासवत, भूषण कह सब कोय ]॥६७७॥
तौलगि या मनसदनमें, हरि आवैं केहि बाट ।
निपटविकट जबलों जुटे, खुलै न कपटकपाट ६७८
सप्तमशतक ७. ( २२१ )
तबतक इस मनरूपी घरमें भगवान् किस बाटसे आवैं
जबतक अतिविकट भिड़े हुए कपाटरूपी किवाड़ नहीं खु-
लते "रूपक" ॥ ६७८ ॥
बुधि अनुमान प्रमाण श्रुति,किये नीठ ठहराय ।
सूक्ष्मगतिपरब्रह्मकी,अलखलखी नहिंजाय६७९
बुद्धि अनुमान और वेदप्रमाणसे मनमें निश्चय ठहरता
है परन्तु परब्रह्मकी सूक्ष्म गति होनेसे तथा अलख होनेसे
लखी नहीं जाती इसीप्रकार कटिभी सूक्ष्म है होतो पर दि-
खाई नहीं देती "अनुमानालंकार" ॥ ६७९ ॥
या भव पारावारको, उलँघि पार को जाय ।
तियछवि छाया ग्राहिणी, गहै बीचही आय६८०
इस जगतरूपी संसारको उल्लंघनकर पार कौन जा सकता
है इसमें तियकी छवि छायाग्राहिणी है, सो बीचही आकर
पकड़लेती है आशय यह कि, स्त्रीसे कोई ही मुक्त होता
है छायाग्राहिणीने महावीरजीको धग था "पूर्णोपमा वा
दृष्टान्त" ॥ ६८० ॥
तज तीरथ हरि राधिका, तनद्युति कर अनुराग ।
जेहिब्रजकेलिनि कुंजमग,पगपगहोतप्रयाग६८१
हे मन ! अनेक तीर्थोंका भ्रमण छोड़कर राधाकृष्णके
शरीरकी कान्तिमें प्रेम कर, जिस ब्रजकी विहारकुंजके
( २२२ ) सतसई-सटीक ।
मार्गमें ( पग पगपर प्रयाग होता है, ) इयाम शरीर यमुना,
राधिकाकी शोभा गंगा दोनोंका अनुराग सरस्वती है
“ अनुज्ञा ” अथवा हे तिय ! रथ त्याग यहां राधाइयामके
चरणोंमें अनुराग कर इस ब्रजमें पग पगमें प्रयाग होता है,
किसीकी स्त्री रथमें बैठी यात्रा करतीथी उसके स्वामीने कहा
है “ काव्यलिंग ” ॥ ६८१ ॥
अपने अपने मत लगे, वाद मचावत शोर ।
ज्यों त्यों सेवो सबहिको, एकै नन्दकिशोर ६८२
अपने २ मतमें लगे सब वृथा शोर मचाते हैं, जैसे तैसे
सबका सेवना एकही नंदकिशोर है “परिसंख्यालंकार” ६८२
तो अनेक अवगुण भरी, चाहै याहि बलाय ।
ज्यों पति सम्पति हू बिना, यदुपति राखैजाय ६८३
सम्पत्ति अनेक अवगुण भरी है, इसकी चाहना हमारी
बलाय करती है, जो कृष्णचंद्र रक्खैं तो सम्पत्ति बिनाभी
पत रहती है “ संभावना ” ॥ ६८३ ॥
दीरघ साँस न लेइ् दुख, सुखसाईं मति भूल ।
दई दई कत करत है, दई दई सुकबूल ॥६८४॥
दुःखसे दीर्घश्वास मत ले सुखके स्वरूप भगवान्को मत
भूले दैव दैव क्यों करता है जो दैवने दिया है सो अंगीकार
कर “ जमकालंकार ” ॥ ६८४ ॥
सप्तमशतक ७. ( २२३ )
दियो सुशींश चढ़ाय ले, आछी भाँति अहेर ।
जापै चाहत सुखलयो, ताके दुखहि नफेरि ६८५
भगवान्ने जो दिया है सो शिरचढ़ाले अच्छी भाँति देख
अंगीकार कर जिससे सुख लियाचाहता है उसके दिये दुःखको
मतफेरे “ विचित्र ” ॥ ६८५ ॥
नीकीदई अनाकनी, फीकी परी गुहारि ।
मनो तज्यो तारन विरह, वारिक वारण तारि ६८६
हे ईश ! आपने अच्छी आनाकानीकी मेरी पुकार सुन-
करभी आनाकानी की, एकबार हाथीको तारकर मानों तारने-
का यशही छोड़ दिया ॥ ६८६ ॥
कौनभांति रहिहै विरद, अब देखनी मुरारि ।
वीधे मोमों आनिकै, गीधे गीधहि तारि ॥ ६८७॥
अब तुम्हारा यश किसप्रकारसे रहेगा सो देखना है हे
मुरारि ! आप मुझसे आकर अटकेहो और पगनेहो गिद्धको
तारकर अर्थात् मुझको किस प्रकारसे तार सकोगेहो “काव्य-
लिंग ” ॥ ६८७ ॥
बंधुभये का दीनके, को तारे रघुराय ।
तूठे तूठे फिरतहो, झूठे विरद कहाय ॥ ६८८ ॥
( २२४ ) सतसई-सटीक ।
हे भगवन् ! आप किस दीनके बंधु हुए आपने किसको
तारा जो प्रसन्नहो लोकोंसे झूठा यश कहलानेको फिरतेहो ॥
थोरेई गुण रीझते, बिसरई वह बानि ।
तुमहू कान्ह मनो भये, आजकालके दानि ६८९
पहले तो थोड़ेसेही गुणसे रीझ जाते थे अब वह बान
बिसरादी, हे कृष्ण! तुम भी मानों आजकालके ढोलिनटके
समान दानी हुए जैसे नट ढोल बजाकर करतब दिखाता है
इस प्रकार दो एक कार्यकर आपने बिरद विख्यात किया
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६८९ ॥
कबको टेरत दीनरत, होत न श्याम सहाय ।
तुमहू लागी जगत गुरु, जगनायक जगवाय ६९०
हे श्याम ! मैं कबका दीनहो टेरता हूं आप मेरे सहाय
नहीं होते हे जगद्गुरु ! आपको भी जगतकी हवा लगी है
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६९० ॥
ज्यों ह्वैहौं त्यों होंहुँगो, हौं हरि अपनी चाल ।
हठ नकरो अतिकठिन है, मोतारिबो गोपाल ६९१
जो हूंगा सो होंऊंगा, हे कृष्ण ! मैं अपनी रीतिपरहूं तुम
हठ न करो मैं महापापी हूँ मेरा तारना अतिकठिन है
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६९१ ॥
सप्तमशतक ७. ( २२५ )
करो कुबत जग कुटिलता, तजो न दीनदयाल ।
दुखी होहुगे सरलहिय, बसत त्रिभंगीलाल ६९२
चाहे सबसंसार मेरी निंदाकरे परन्तु मैं कुटिलता न छोडूँगा,
हृदय सीधा न करूंगा, हे दीनदयालु ! आप सीधा हृदय
करनेसे दुःखीहोगे कारण कि, मेरे हृदयमें त्रिभंगी-
छविकी आपकी मूर्त्ति निवास करती है चरण कटि ग्रीवा ति-
रछी कर खड़े होनेको त्रिभंगी कहते हैं सूधे हृदयमें टेढा
आपसे न रहा जायगा " काव्यलिंग " ॥ ६९२ ॥
मोहिं तुम्हें बाढी बहस, को जीतै यदुराज ।
अपने २ बिरदकी, दुहूँ निबाहनि लाज ॥६९३॥
हे यदुराज ! मुझमें और तुममें बहस पड़ी है देखें
कौन जीतै अपने २ बिरदकी दोनों लाज निबाहैं ये अर्थात्
मैं तौ अपना पतितपन नहीं छोडूँगा और आप अपना पतित
पावनपन नहीं छोडेंगे " विरोधाभास " ॥ ६९३॥
समै पलट पलटै प्रकृति, को न तजै निज चाल ।
भों अकरुण करुणा करौ-यह कपूत कलिकाल ॥
- समयके पलटनेमें रागरागिनी बदलती है अपनी चाल
१५
( २२६ ) सतसई-सटीक ।
कौन नहीं छोडदेता हे दयालु ! आप भी करुणारहित हुए
अब दया करो यह कलिकाल महाकपूत है "सहोक्ति" ६९४
तौवलिये भलिए वनी, नागर नन्दकिशोर ।
जो तुम नीकेकै लखो, मो करनीकी ओर ६९५
म बलिहारी जाऊं हे नागरनन्दकिशोर ! तो तौ भली ही
बनजाय जो आप भली प्रकारसे मेरी करनीकी ओर देखा
" सम्भावना लंकार " ॥ ६९५ ॥
हरि कीजत तुमसों यहै, बिनती बार हजार ।
जेहितेहि भांति ड्योरहौं, पर्योरहौं दरबार ६९६
हे हरि ! आपसे वारंवार यही विनती है कि, जिस तिस
भाँतिसे डरता हुआ आपके दरबारमें पड़ा रहूं " लोकोक्ति
अलंकार " ॥ ६९६ ॥
निजकरनी सकुचौंहिकत, सकुचावत इहिचाल ।
मोहूसे अतिविमुखसों, सन्मुख होत गुपाल ६९७॥
एक तो मैं अपनी करनीसे सकुचाता हूं फिर आप इस री-
तिसे क्यों सकुचातेहो कि, आप मुझसे अति विमुखके भी
सन्मुख होते हो हे कृष्ण ! " परिकरांकुर " ॥ ६९७ ॥
सप्तमशतक ७. ( २२७ )
कीजै चित सोई तरौं, जेहि पतितनके साथ ।
मेरे गुण अवगुण गणनि,गिनौ न गोपीनाथ६९८॥
हे कृष्ण ! चित्तमें वही कीजिये जिससे मैं पतितोंके साथ
तरजाऊं हे गोपीनाथ!आप मेरे गुण अवगुणकी गिन्ती नकरो
" दीपकालंकार " ॥ ६९८ ॥
प्रगटभये द्विजराजकुल,सुवस बसे ब्रजआय ।
मेरे हरो कलेश सब,केशव केशव राय ॥ ६९९॥
चन्द्रवंशमें प्रगट होकर ब्रजमें आनकर बसे केशवभग-
वान् और केशवराय ( पिता ) मेरे सब क्लेश हरें, पिताके
पक्षमें, जो ब्राह्मणश्रेष्ठकुलमें उत्पन्न हुए और ब्रजमें आन-
कर बसे " श्लेषालंकार " ॥ ६९९ ॥
सोरठा ।
मोहूदीजे मोष, ज्यों अनेक अधमन दियो ।
जो बांधि ही तोष, तों बांधो अपने गुणन॥ ७००॥
हे भगवन् मुझे भी आप मुक्ति दीजिये जैसे अनेक अ-
धर्मियोंको दी है और जो बाँधिहीमें सन्तोष हो तो अपने
गुणोंसे बांधो "श्लेषालंकार" ॥ ७०० ॥
(२२८) सतसई-सटीक ।
चलतपाय निर्गुणी गुणी, धन मणि मोतीमाल ।
भेंटभये जयशाहसों, भाग चाहियत भाल ७०१॥
गुणी निर्गुणीभी जिसको पाकर धनमणि मोतीमाला
लेकर जाते हैं जयशाहसे भेंट होनेपर माथेमें भाग्य चाहिये
“काकोक्ति” ॥ ७०१ ॥
रहति न रण जयशाहमुख, लखि लाखनकी फौज।
जाचि निराखर हू चलै, लैलाखनकी मौज ७०२॥
लाखों मनुष्योंकी सेनाभी युद्धमें जयशाहका मुख देख
स्थित नहीं रहसकती और मांगकर निरक्षरभी जिनसे लाखों
लेजाते हैं ॥ ७०२ ॥
प्रतिबिम्बित जयशाहदुति, दीपति दर्पणधाम ।
सब जग जीतनको कियो, कायव्यूह मनु काम ॥
शीशमहलमें राजा जयशाहकी परछाहीं दीप्तिको प्राप्त
होती है मानों सब जगत् जीतनेको कामदेवने अपनी काया-
का व्यूह (समूह) रचा है “उत्प्रेक्षा लंकार” ॥ ७०३ ॥
घर घर हिन्दुनि तुरकिनी, देत अशीश सराह ।
पतिनु राखि चादर चुरी, पति राखी जयशाह ७०४
सप्तमशतक ७. ( २२९ )
घर घरमें हिन्दुओंकी और तुरकोंकी स्त्री सराहना कर
अशीश देती हैं कि, हमारे पतियोंकी रक्षाकर जय शाहने
हमारी चूरी और चादर रक्खी वैधव्यमें हिन्दुओंमें चूरी और
तुरकोंमें चादरका त्याग होता है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ७०४॥
सामा सेन सयानकी, सबै शाहके साथ ।
बाहुबली जयशाहजू, फते तिहारे हाथ ॥७०५॥
सामान सेना चातुरीयुक्त सब दिल्लीपतिकी शाहके
साथ है परन्तु हे बाहुबली जयशाहजी ! फतह ( जीत )
आपहीके हाथ है 'तुम जहाँ जातेहो जीततेहो' ( दक्षिणका
युद्ध है ) ॥७०५॥
हुकम पाय जयशाहको, हरिराधिकाप्रसाद ।
करी बिहारी सतसई, भरी अनेक सवाद॥७०६॥
जयशाहका हुकम पाकर हरि राधिकाके प्रसादसे बिहारी-
दासने अनेक संवादभरी सतसई निर्माण करी ॥ ७०६ ॥
सम्बतग्रहशशिजलधिक्षिति, छठतिथिवासरचंद।
चैतमास पख कृष्णमें, पूरण आनंदकंद॥७०७॥
संवत १७१९ में चैत्रकृष्ण छठ चंद्रवारके दिन यह सत-
सई पूर्णहुई ग्रह ९ शशि १ जलधि ७ क्षिति १ अंकों
की वामगतिसे १७१९ सम्बत हुए ॥ ७०७ ॥