बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. ( २१५ )
जिससमय सब मेघ एकसाथ जुरकर वर्षा करने लगे
उस गिरधारीने प्रसन्नहो हाथपर पर्वत धारणकर इन्द्रका
गर्व हरण किया "काव्यलिंग" ॥ ६६१ ॥
यों दल काढे बलखते, तैं जयसाह भुआल ।
उदर अघासुरके परे, ज्यों हरि गाय गुवाल६६२
जिस समय जयशाहकी सेना बलखपर चढकर ऐसी घिरी
कि, कहीं मार्ग दिखाई नहीं देताथा तब कौशलसे जयशाहने
निकाली उसपर कहते हैं हे जयशाह ! तैने बलखबुखारके
घेरेमेंसे इसप्रकार अपनी सेना निकाली कि, जैसे अघासुरके
उदरसे कृष्णने गाय ग्वाल निकालेथे"दृष्टान्तालंकार" ६६२
मोहनि मूरति श्यामकी, अति अद्भुत गति जोय।
बसत सुचित अंतर तऊ, प्रतिबिंबित जग होय ॥
श्यामकी मनमोहनी मूर्त्तिकी अद्भुत गति तो देखो कि,
चित्तके अन्तरमें निवास करती है और छाया संसारमें दृष्टि
आती है मलीन जगतमें भी ब्रह्मनिष्ठको श्यामका प्रतिबिंब
दीखता है यह अद्भुतगति है अद्भुत सुविचार " विशेष
अलंकार ॥ ६६३ ॥
या अनुरागी चित्तकी, गति समझे नहिं कोय ।
ज्यों ज्यों बूड़े स्यामरँग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय॥