बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. ( २२७ )
कीजै चित सोई तरौं, जेहि पतितनके साथ ।
मेरे गुण अवगुण गणनि,गिनौ न गोपीनाथ६९८॥
हे कृष्ण ! चित्तमें वही कीजिये जिससे मैं पतितोंके साथ
तरजाऊं हे गोपीनाथ!आप मेरे गुण अवगुणकी गिन्ती नकरो
" दीपकालंकार " ॥ ६९८ ॥
प्रगटभये द्विजराजकुल,सुवस बसे ब्रजआय ।
मेरे हरो कलेश सब,केशव केशव राय ॥ ६९९॥
चन्द्रवंशमें प्रगट होकर ब्रजमें आनकर बसे केशवभग-
वान् और केशवराय ( पिता ) मेरे सब क्लेश हरें, पिताके
पक्षमें, जो ब्राह्मणश्रेष्ठकुलमें उत्पन्न हुए और ब्रजमें आन-
कर बसे " श्लेषालंकार " ॥ ६९९ ॥
सोरठा ।
मोहूदीजे मोष, ज्यों अनेक अधमन दियो ।
जो बांधि ही तोष, तों बांधो अपने गुणन॥ ७००॥
हे भगवन् मुझे भी आप मुक्ति दीजिये जैसे अनेक अ-
धर्मियोंको दी है और जो बाँधिहीमें सन्तोष हो तो अपने
गुणोंसे बांधो "श्लेषालंकार" ॥ ७०० ॥