बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. (२३३)
अँसुवनि करति तरोसके, क्षणक खरोहे नीर ॥
हे कृष्ण ! तुम्हारी सुरतकर राधिका यमुनाके तटको ता-
कती है आँसुओंसे क्षणमात्रमें तरोसके जलको खारि करदे-
तीहै तरोस-तलछट, "उल्हासालंकार" खरोह-खारी अथवा
गुनगुना, करोह पाठमें आंसुओंसे मिलनेसे काला ॥ ६५५ ॥
लोपे कोपे इन्द्रलौं, रोपे प्रलय अकाल ।
गिरिधारी राखेसबै, गो गोपी गोपाल ॥६५६ ॥
हे उद्धवजी ! जिससमय कृष्णने इन्द्रका यज्ञ लोपा तब
उसने कोपकर अकालप्रलय ( रोपा ) करनी चाही उससमय
गिरि धारण करके सब गो गोपी गोपालकी रक्षा कीथी "प-
रिकरांकुरवृत्त्यनुप्रासालंकार," [ दो०-अभिप्रायके सहित
जहाँ,हो विशेष्य सुखदान । परिकरांकुर तेहि कहत, कविजन
परमसुजान ॥ ६५६ ॥
हौं हारी कैकै हहा, पाँइन पारो प्यौर ।
लेह कहा अजहूँ किये, तेहतररे त्यौर ॥ ६५७ ॥
हम सब हाहाखाय समझा २ वा कह कह कर हारगई तथा
प्रीतमको पाँवमें डाला इससे तू क्या लेगी जो अब भी
क्रोधमें बड़ी २ आँखें कर देखती है "विशेषोक्ति" ॥६५७॥
अनी बडी उमडत लखै, अभिवादक भटभूप ।