बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. ( २२१ )
तबतक इस मनरूपी घरमें भगवान् किस बाटसे आवैं
जबतक अतिविकट भिड़े हुए कपाटरूपी किवाड़ नहीं खु-
लते "रूपक" ॥ ६७८ ॥
बुधि अनुमान प्रमाण श्रुति,किये नीठ ठहराय ।
सूक्ष्मगतिपरब्रह्मकी,अलखलखी नहिंजाय६७९
बुद्धि अनुमान और वेदप्रमाणसे मनमें निश्चय ठहरता
है परन्तु परब्रह्मकी सूक्ष्म गति होनेसे तथा अलख होनेसे
लखी नहीं जाती इसीप्रकार कटिभी सूक्ष्म है होतो पर दि-
खाई नहीं देती "अनुमानालंकार" ॥ ६७९ ॥
या भव पारावारको, उलँघि पार को जाय ।
तियछवि छाया ग्राहिणी, गहै बीचही आय६८०
इस जगतरूपी संसारको उल्लंघनकर पार कौन जा सकता
है इसमें तियकी छवि छायाग्राहिणी है, सो बीचही आकर
पकड़लेती है आशय यह कि, स्त्रीसे कोई ही मुक्त होता
है छायाग्राहिणीने महावीरजीको धग था "पूर्णोपमा वा
दृष्टान्त" ॥ ६८० ॥
तज तीरथ हरि राधिका, तनद्युति कर अनुराग ।
जेहिब्रजकेलिनि कुंजमग,पगपगहोतप्रयाग६८१
हे मन ! अनेक तीर्थोंका भ्रमण छोड़कर राधाकृष्णके
शरीरकी कान्तिमें प्रेम कर, जिस ब्रजकी विहारकुंजके