बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. (२१७)
जप माला छापा तिलक, सरै न एको काम ॥
मनकाचे नाचे वृथा, साँचे रांचे राम ॥ ६६८ ॥
जप माला छापा तिलक इनसे एक भी काम नहीं निक-
लता है जो मन कच्चाहै तो नाचना वृथा है राम तो साँचेसे मि-
लते हैं अथवा जप माला छापा तिलक करनेसे पुराने क्या
नये का भी काम निकलजाता है, मन कच्चे और वृथाही नाचे
परन्तु राम साँचे ही मिले जप माला छापांस एक अपराधी
की रक्षा हुई थी राजाकी आज्ञा थी मच्छी मत मारना एक
धीमर इस आज्ञाको उल्लंघन कर मच्छी मारने लगा उधरसे
राजाकी सवारी आई तब यह झट टीका लगाय जालके दा-
नोंकी माला फेरने लगा राजा प्रणामकर चला गया “परि-
संख्या” ॥ ६६८ ॥
जगत जनायो जिन सकल, सो हरि जान्योनाहि ॥
ज्यों आंखनजगदेखियै, आंखनदेखिजाहि ६६९
जिन हरिने सब जगत् उपजाया है वे जाननेमें नहीं आते
जैसे आंखसे सब जगत् देखता है परन्तु आंख नहीं देखी-
जाती “दृष्टांत” जनाया-उपजाया चेतन किया॥६६९॥
भजन कह्यो ताते भज्यो, भज्यो न एको बार ।
दर भजन जाते कह्यो, सो तैं भज्यो गंवार॥६७०॥