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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 290 में से

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पृष्ठ 272

दूर भाजते हैं. अर्थात् डोरा और राजस बढानेके समय दूर
भागते हैं. जिस समय ( डोरा ) गुणा बढायाजाता है चंग दूर
चला जाता है, और स्वामीके निकट निर्गुणता प्रगट करते हैं,
आशय यह कि, डोरा पाकर जैसे चंग दूर जाता है, इसीप्रका-
र रजोगुणकी शक्ति पानेसे राजा प्रभुको भूल जाते हैं, और
जब वह अपना रजोगुणी ऐश्वर्य खेंचलेता है तब दीन दुःखी
हो आठ पहर प्रभुको मनाते हैं, अथवा प्रभुके गुण विस्तार
समय विषय पीठ देकर भागते हैं, तब गुणीकी खोज होती
है, कोई क्षीरसागर और कोई वैकुंठमें खोज करते हैं, जब
निर्गुणब्रह्म कहाजाता है तब व्यापक होनेसे निकटही भास-
ता है आशय यह कि, रज तमकी वृद्धिमें चंगकी भांति प्रभु
से दूर होना है। "श्लेषालंकार" ॥ ६७३ ॥
नटुवालौं प्रभुकर गहै, निगुणी गुण लपटाय ।
वहै गुणी करते छुटै, निगुणीपै ह्वै जाय ॥ ६७४ ॥
लट्टूकी भाँति जब प्रभु हाथमें पकड़ते हैं तब निर्गुणको
गुण लिपटता है वही गुणी हाथसे छूटनेपर निर्गुणी होजाता है
आशय यह कि, जयशाह जिस निर्गुणीको अपने पास रखते
हैं वह गुणी होजाता है और छूटनेपर निर्गुणी होता है जैसे
लट्टू "श्लेषालंकार पूर्णोपमा" ॥ ६७४ ॥
जात जात वित होत है, ज्यों जियमें संतोष ।