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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 269

( २१६ ) सतसई-सटीक ।
इस प्रेमवाले चित्तकी गति कोई नहीं समझता है कि,
ज्यों ज्यों श्यामरंगमें डूबता है त्यों त्यों निर्मल होता है अ-
र्थात् श्रृंगारमय होता है "विषमालंकार संभावना" ॥६६४॥
सोरठा ।
मैं समझो निरधार, यह जग काचो काँचसों ।
एकैरूप अपार, प्रतिबिंबित लखियत जहां ६६५
मैंने विचारकर देखलिया, यह जगत् कच्चा कांचसा है
जिसमें परमात्माके एकरूपके अनन्त प्रतिबिम्ब देखे जाते
हैं "पूर्णोपमा" ॥ ६६५ ॥
दो०-कोऊ कोटिक संग्रहौ, कोऊ लाख हजार ।
मो संपति यदुपति सदा,विपति विदारनहार६६६
कोई करोड कोई लाख हजार द्रव्यका संग्रह करो परन्तु
मेरी सम्पत्तितो विपत्ति विदारणहार सदा यदुपतिही हैं
"व्यतिरेक" ॥ ६६६ ॥
यमकरि मुँहतरहरपरचो, यह धरहर चितलाय ।
विषयतृषापरिहरिअजौं, नरहरिकेगुणगाय ६६७
यमरूपी हाथी नीचा मुख किये तले पड़ा है; यह मनमें
धारण कर हरिमें चित्त लगा विषयरूपी तृष्णाको अब भी
छोड़कर नृसिंहजीके गुण गानकर "परिसंख्या" ॥६६७॥