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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 265

( २१२ ) सतसई-सटीक ।
चित पितुघातक योग लखि, भयो भये सुत सोग।
फिर हुलसो जिय जोतसी, समझो जारज योग ॥
पुत्र होनेपर पितुघातक योग देखकर ज्योतिषीको पुत्रके
होनेका शोक हुआ फिर जारजयोग जानकर प्रसन्नहुए आशय
यह कि, यह जारसे उत्पन्नहै ऐसा होनेसे जारका घातकहै इ-
सकारण प्रसन्न हुए “लेखांलंकार ॥ ६५२ ॥
बहुधन लै अहसानकें, पारो देति सराहि ।
वैदवधू हँसि भेदसों, रही नाह मुखचाहि ॥६५३॥
वैद्य बहुतसा धनले अहसानकर सराहना करके दूसरोंको
पारादेताहै, परन्तु इस बातसे हँसकर वैद्यकी स्त्री भेदसे स्वा-
मीका मुख देखकररही “अनुमानालंकार” हँसनेसे वैद्यमें न-
पुंसकताका अनुमान है ॥ ६५३ ॥
गोपनके अँसुअनभरी, सदा असोत अपार ।
डगर डगरने ह्वैरही, बगरबगरके बार ॥ ६५४ ॥
उद्धवजीका वचन श्रीकृष्णसे गोपियोंके आंसुओंसे भरी
विनाही सोतेवाली नसूखनेवाली अपारनदी ब्रजकी गली
गलीमें नहीं किन्तु घर घरके बाहर होरहीहै “अत्युक्ता-
लंकार” ॥ ६५४ ॥
श्याम सुरतिकर राधिका, तकत तरणिजा तीर ।