बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. ( २२५ )
करो कुबत जग कुटिलता, तजो न दीनदयाल ।
दुखी होहुगे सरलहिय, बसत त्रिभंगीलाल ६९२
चाहे सबसंसार मेरी निंदाकरे परन्तु मैं कुटिलता न छोडूँगा,
हृदय सीधा न करूंगा, हे दीनदयालु ! आप सीधा हृदय
करनेसे दुःखीहोगे कारण कि, मेरे हृदयमें त्रिभंगी-
छविकी आपकी मूर्त्ति निवास करती है चरण कटि ग्रीवा ति-
रछी कर खड़े होनेको त्रिभंगी कहते हैं सूधे हृदयमें टेढा
आपसे न रहा जायगा " काव्यलिंग " ॥ ६९२ ॥
मोहिं तुम्हें बाढी बहस, को जीतै यदुराज ।
अपने २ बिरदकी, दुहूँ निबाहनि लाज ॥६९३॥
हे यदुराज ! मुझमें और तुममें बहस पड़ी है देखें
कौन जीतै अपने २ बिरदकी दोनों लाज निबाहैं ये अर्थात्
मैं तौ अपना पतितपन नहीं छोडूँगा और आप अपना पतित
पावनपन नहीं छोडेंगे " विरोधाभास " ॥ ६९३॥
समै पलट पलटै प्रकृति, को न तजै निज चाल ।
भों अकरुण करुणा करौ-यह कपूत कलिकाल ॥
- समयके पलटनेमें रागरागिनी बदलती है अपनी चाल
१५