बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. ( २११ )
हास्यरसवर्णन ।
रवि वन्दो कर जोरकै, सुनत श्यामके वैन ।
भये हँसोहे सबनिके, अति अनखोहे नैन॥६४९॥
जिससमय गोपियें चीरहरणके समय हाथसे अंग छिपाय
जलसे बाहरहुईं तब कृष्णने कहा हाथ जोड़ सूर्यको प्रणाम
करो यह सुनकर बालाओंके क्रोधभरे नेत्रोंमें हँसी आगई
"पर्यायालंकार" ॥ ६४९ ॥
कण देव्यो सौंप्यो ससुर, बहू थुरहथी जानि ।
रूप रहिचटै लगिलग्यो, मांगन सब जग आनि ॥
ससुरने बहूको छोटे हाथकी जानकर अन्न देना सौंपा उस-
के रूपके लालचसे सब जगतके लोग आकर मांगनेलगे
"विषादालंकार" अन्न थोडा उठेगा इसकारण काम
सौंपा सो उसके विरुद्ध अधिक उठनेलगा इससे विषाद
हुआ ॥ ६५० ॥
परतिय दोष पुराण सुनि, हँस मुलकी मुखदानि ।
कसकरि राखी मिश्रहू, मुँह आई मुसकानि॥६५१॥
पुराणमें परस्त्रियोंके गमनका दोष सुनकर सुखदायक थो-
ड़ा मुसकाकर हँसी तथा मिश्र ( पुराणवक्ता ) नेभी मुखआई
मुस्कान दबाकर रक्खी "अनुमान" ॥ ६५१ ॥