बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२२०) सतसई-सटीक ।
होत होत जो होय तो, होय घरैंमें मोष ॥६७५॥
धन जातेर मनमें संतोष होता है होतेरभी धन जो संतोष
हो ता घडीमें वा घरही मुक्त होय “विभावना” ॥ ६७५ ॥
ब्रजवासिनको उचित धन, सो धन रुचित न कोय।
सुचित न आयो सुचितई, कहो कहांते होय ६७६
ब्रजवासियोंका उचित धन श्रीकृष्णके प्रेमरूपी धन
किसीके चित्तमें न आया तो पवित्रता और स्थिरता कहांसे
होगी “पर्यायोक्ति व्यावृत्तिदीपकालंकार” ॥ ६७६ ॥
मनमोहनसे मोहकरि, तू घनश्याम सँभारि ।
कुंजविहारीसों विहारि, गिरिधारी उर धारि ६७७॥
हे मानवती ! तू मानसे निर्मोही होरही है मनमोहनसे
मोह (प्रेम) कर इन घनश्याम (काले मेघ) को देखकर
उनको संभार वे इस समय कुंजमें स्थित हैं तू भी कुंजमें चल-
कर उनके साथ विहार कर वे गिरिधारी सबके रक्षक हैं इस
समय तू उनको हृदयसे लगाय धारण कर “पुनरुक्तवदाभा-
सालंकार” [ दो०-अर्थ लखै पुनरुक्तसों, अरु पुनरुक्त न
होय। सो पुनरुक्त्याभासवत, भूषण कह सब कोय ]॥६७७॥
तौलगि या मनसदनमें, हरि आवैं केहि बाट ।
निपटविकट जबलों जुटे, खुलै न कपटकपाट ६७८