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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 276

सप्तमशतक ७. ( २२३ )
दियो सुशींश चढ़ाय ले, आछी भाँति अहेर ।
जापै चाहत सुखलयो, ताके दुखहि नफेरि ६८५
भगवान्ने जो दिया है सो शिरचढ़ाले अच्छी भाँति देख
अंगीकार कर जिससे सुख लियाचाहता है उसके दिये दुःखको
मतफेरे “ विचित्र ” ॥ ६८५ ॥
नीकीदई अनाकनी, फीकी परी गुहारि ।
मनो तज्यो तारन विरह, वारिक वारण तारि ६८६
हे ईश ! आपने अच्छी आनाकानीकी मेरी पुकार सुन-
करभी आनाकानी की, एकबार हाथीको तारकर मानों तारने-
का यशही छोड़ दिया ॥ ६८६ ॥
कौनभांति रहिहै विरद, अब देखनी मुरारि ।
वीधे मोमों आनिकै, गीधे गीधहि तारि ॥ ६८७॥
अब तुम्हारा यश किसप्रकारसे रहेगा सो देखना है हे
मुरारि ! आप मुझसे आकर अटकेहो और पगनेहो गिद्धको
तारकर अर्थात् मुझको किस प्रकारसे तार सकोगेहो “काव्य-
लिंग ” ॥ ६८७ ॥
बंधुभये का दीनके, को तारे रघुराय ।
तूठे तूठे फिरतहो, झूठे विरद कहाय ॥ ६८८ ॥