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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 281

(२२८) सतसई-सटीक ।
चलतपाय निर्गुणी गुणी, धन मणि मोतीमाल ।
भेंटभये जयशाहसों, भाग चाहियत भाल ७०१॥
गुणी निर्गुणीभी जिसको पाकर धनमणि मोतीमाला
लेकर जाते हैं जयशाहसे भेंट होनेपर माथेमें भाग्य चाहिये
“काकोक्ति” ॥ ७०१ ॥
रहति न रण जयशाहमुख, लखि लाखनकी फौज।
जाचि निराखर हू चलै, लैलाखनकी मौज ७०२॥
लाखों मनुष्योंकी सेनाभी युद्धमें जयशाहका मुख देख
स्थित नहीं रहसकती और मांगकर निरक्षरभी जिनसे लाखों
लेजाते हैं ॥ ७०२ ॥
प्रतिबिम्बित जयशाहदुति, दीपति दर्पणधाम ।
सब जग जीतनको कियो, कायव्यूह मनु काम ॥
शीशमहलमें राजा जयशाहकी परछाहीं दीप्तिको प्राप्त
होती है मानों सब जगत् जीतनेको कामदेवने अपनी काया-
का व्यूह (समूह) रचा है “उत्प्रेक्षा लंकार” ॥ ७०३ ॥
घर घर हिन्दुनि तुरकिनी, देत अशीश सराह ।
पतिनु राखि चादर चुरी, पति राखी जयशाह ७०४