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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 271

( २१८ ) सतसई-सटीक ।
हे मन ! भजनकरनेको कहा और तू उससे भाजा एक वा-
रभी उसका भजन न किया, हे गँवार ! जिससे दूर भागना
( विषयसे ) कहा है सो तैने भजन किया "यमक" आशय
यह कि, ईश्वरको न भजा विषयको भजा ॥ ६७० ॥
पतवारी माला पकरि, और न कछू उपाव ।
तरि संसारपयोधिको, हरिनामें करि नाव ॥ ६७१ ॥
पतवाररूपी मालापकड़ और कुछ उपाय नहीं है इसप्रकार
परमात्माके नामकी नावको आश्रयकर संसारसागरके पार
होजा "रूपक" ॥ ६७१ ॥
यह बिरियां नहिं औरकी, तू किरिया वह शोधि ।
पाहननावचढाय जेहि, कीन्होपारपयोधि ॥ ६७२ ॥
यह समय औरका नहीं है हे मन ! तू उस पार उतारनेवाले
की खोजकर जिसने पत्थरपर अपने नामसे रीछ वानरोंको
चढाकर सागर पार करदिया "काव्यलिंग" ॥ ६७२ ॥
दूर भजत प्रभु पीठ दै, गुणविस्तारन काल ।
प्रगटत निर्गुण निकटरहि, चंगरंग भूपाल ॥ ६७३ ॥
गुण विस्तारके समय पीठ देकर दूर भागजाते हैं निर्गुण
के पासही प्रगट होते हैं, प्रभु राजा चंगके समान हैं अथवा चंग
और कलिके राजा की समानता वर्णन की है स्वामीके पाससे