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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 267

( २१४ ) सतसई-सटीक ।
मंगल कारि मान्यो हिये, भोमुख मंगलरूप॥६५८
शत्रुका कटक बड़ा चारों ओरसे उमड़ा देखकर खड्ग-
धारी वीर राजा ( जयसाह ) ने उसे मनमें मंगल करके माना
और मुख मंगलरूप ( लालवर्ण ) हुआ । मंगलका लालव-
र्ण है “विभावना” ॥ ६५८ ॥
नाह गरज नाहर गरज, वचन सुनायो टेरि ।
फँसीफौज बिच बन्दिमें, हँसी सबानिमुखहेरि६५९
रुक्मिणीहरणका समय, मत्तसिंहकी गरजसे गरजे और
सबको पुकारकर यह वचन सुनाया, विरोधियोंकी सेनाकी
बांदिमें फँसी, और सब राक्षसोंका मुख देख हँसी ॥ ६५९ ॥
डिगतपानि डिगलातगिरि, लखि सब ब्रज बेहाल।
कम्प किशोरीदरशते, खरे लजाने लाल ॥६६०॥
हाथके हलनेसे गोवर्द्धनपर्वतभी हिलता है यह देखकर
सब ब्रज बेहाल होगया, राधिकाको देखकर (सात्त्विकहोनेसे)
कम्प हुआ इसकारण स्वयं लाल ( कृष्ण ) लजाये आशय
यह कि, ब्रजवासी न जानें कि, राधिकाकी प्रीति है
“हेतुअलंकार” ॥ ६६० ॥
प्रलयकरन बरसनलगे, जुरि जलधर इकसाथ ।
सुरपति गर्व हरो हरषि, गिरिधर गिरिधर हाथ ॥