बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१० ) सतसई-सटीक ।
हाथमें ले सूंघ कर सराहना कर सब गँवार मौन होरहे
हे गन्धी!गुलाबकी गन्धका गाँवमें कौन ग्राहक है जो मोल ले
ऐसाही गुणीका मूर्खोमें गुण प्रकाश करना है "अन्यो०"६४५
करि फुलेलको आचमन, मीठो कहति सराहि ।
चुपकरि रहु गंधी चतुर,अतरदिखावतकाहि६४६
ग्रामीण फुलेलका आचमन कर सराहना कर मीठा कहने
लगे, हेचतुर गंधी! चुपकर, अतर किसको दिखाता है मूर्खोंके
आगे चतुरकी विडम्बनामें उक्ति ॥ ६४६ ॥
कनक कनकते सौगुणी, मादकता अधिकाय।
उहि खावे बौराय जग, यह पाये बौराय॥६४७॥
( कनक ) धतूरेसे ( कनक ) सोनेमें सौगुणी मादकता
अधिक है वह खानेसे बौरा होता है परन्तु सुवर्णके पातेही
जग बौराजाता है “व्यतिरेकालंकार” ॥ ६४७ ॥
बड़े न हूजे गुणन बिन, बिरद बड़ाई पाय ।
कहत धतूरेसों कनक,गहने गढो न जाय॥६४८॥
गुणके विना यश बड़ाई पाकर बड़ाहोना उचित नहीं
धतूरेकोभी कनक ( सोना ) कहते हैं परन्तु वह गहनेमें नहीं
गढाजाता है “अन्तरन्यास” ॥ ६४८ ॥