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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

( २२२ ) सतसई-सटीक ।
मार्गमें ( पग पगपर प्रयाग होता है, ) इयाम शरीर यमुना,
राधिकाकी शोभा गंगा दोनोंका अनुराग सरस्वती है
“ अनुज्ञा ” अथवा हे तिय ! रथ त्याग यहां राधाइयामके
चरणोंमें अनुराग कर इस ब्रजमें पग पगमें प्रयाग होता है,
किसीकी स्त्री रथमें बैठी यात्रा करतीथी उसके स्वामीने कहा
है “ काव्यलिंग ” ॥ ६८१ ॥
अपने अपने मत लगे, वाद मचावत शोर ।
ज्यों त्यों सेवो सबहिको, एकै नन्दकिशोर ६८२
अपने २ मतमें लगे सब वृथा शोर मचाते हैं, जैसे तैसे
सबका सेवना एकही नंदकिशोर है “परिसंख्यालंकार” ६८२
तो अनेक अवगुण भरी, चाहै याहि बलाय ।
ज्यों पति सम्पति हू बिना, यदुपति राखैजाय ६८३
सम्पत्ति अनेक अवगुण भरी है, इसकी चाहना हमारी
बलाय करती है, जो कृष्णचंद्र रक्खैं तो सम्पत्ति बिनाभी
पत रहती है “ संभावना ” ॥ ६८३ ॥
दीरघ साँस न लेइ् दुख, सुखसाईं मति भूल ।
दई दई कत करत है, दई दई सुकबूल ॥६८४॥
दुःखसे दीर्घश्वास मत ले सुखके स्वरूप भगवान्को मत
भूले दैव दैव क्यों करता है जो दैवने दिया है सो अंगीकार
कर “ जमकालंकार ” ॥ ६८४ ॥