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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 279

( २२६ ) सतसई-सटीक ।
कौन नहीं छोडदेता हे दयालु ! आप भी करुणारहित हुए
अब दया करो यह कलिकाल महाकपूत है "सहोक्ति" ६९४
तौवलिये भलिए वनी, नागर नन्दकिशोर ।
जो तुम नीकेकै लखो, मो करनीकी ओर ६९५
म बलिहारी जाऊं हे नागरनन्दकिशोर ! तो तौ भली ही
बनजाय जो आप भली प्रकारसे मेरी करनीकी ओर देखा
" सम्भावना लंकार " ॥ ६९५ ॥
हरि कीजत तुमसों यहै, बिनती बार हजार ।
जेहितेहि भांति ड्योरहौं, पर्योरहौं दरबार ६९६
हे हरि ! आपसे वारंवार यही विनती है कि, जिस तिस
भाँतिसे डरता हुआ आपके दरबारमें पड़ा रहूं " लोकोक्ति
अलंकार " ॥ ६९६ ॥
निजकरनी सकुचौंहिकत, सकुचावत इहिचाल ।
मोहूसे अतिविमुखसों, सन्मुख होत गुपाल ६९७॥
एक तो मैं अपनी करनीसे सकुचाता हूं फिर आप इस री-
तिसे क्यों सकुचातेहो कि, आप मुझसे अति विमुखके भी
सन्मुख होते हो हे कृष्ण ! " परिकरांकुर " ॥ ६९७ ॥