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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

( २२४ ) सतसई-सटीक ।
हे भगवन् ! आप किस दीनके बंधु हुए आपने किसको
तारा जो प्रसन्नहो लोकोंसे झूठा यश कहलानेको फिरतेहो ॥
थोरेई गुण रीझते, बिसरई वह बानि ।
तुमहू कान्ह मनो भये, आजकालके दानि ६८९
पहले तो थोड़ेसेही गुणसे रीझ जाते थे अब वह बान
बिसरादी, हे कृष्ण! तुम भी मानों आजकालके ढोलिनटके
समान दानी हुए जैसे नट ढोल बजाकर करतब दिखाता है
इस प्रकार दो एक कार्यकर आपने बिरद विख्यात किया
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६८९ ॥
कबको टेरत दीनरत, होत न श्याम सहाय ।
तुमहू लागी जगत गुरु, जगनायक जगवाय ६९०
हे श्याम ! मैं कबका दीनहो टेरता हूं आप मेरे सहाय
नहीं होते हे जगद्गुरु ! आपको भी जगतकी हवा लगी है
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६९० ॥
ज्यों ह्वैहौं त्यों होंहुँगो, हौं हरि अपनी चाल ।
हठ नकरो अतिकठिन है, मोतारिबो गोपाल ६९१
जो हूंगा सो होंऊंगा, हे कृष्ण ! मैं अपनी रीतिपरहूं तुम
हठ न करो मैं महापापी हूँ मेरा तारना अतिकठिन है
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६९१ ॥