बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
षष्ठशतक ६. ( १८१ )
मुख धोय जल हाथमें ले शिरको झुवाय बालोंको भिजोय
मुड़कर ऊँची होकर घुटनोंतक नवकर नारि सरोवरमें स्नान
करतीहै "जातिअलंकार" ॥ ५५३ ॥
छिरके नाह नवोढ दृग, करि पिचकी जलजोर ।
रोचनरँग लाली भई, विय तिय लोचनकोर ५५४॥
प्रीतमने जलके जोरसे नवोढाके नेत्र छिड़के, और
उसीसमय दूसरी सौतके नेत्रोंकि कोयोंमें गोरोचनके समान
लालीहुई "असंगति" ॥ ५५४ ॥
चलतललितश्रमस्वेदकण, कलितअरुणमुखऐन ।
वनविहारथाकी तरुनि, खरे थकाये नैन ॥५५५॥
चलनेसे जो मनोहर पसीनेके कण आगये उससे मुख-
रूपी स्थान लालीकी शोभायुक्त हुआ; और जब विहारकर
तरुणी थकित हुई तब उसके प्रीतमके नैन उसे देखते २ थ-
कित होगये । “ जाति० ” ॥ ५५५ ॥
बढतविकसिकुचकोररुचि, कढ़त गौरभुजमूल ।
मनु लुटगो लोटनु चढत, चूटत ऊँचे फूल ५५६॥
प्रियवचन सखीसे, जिस समय वह ऊँचा हाथकर फूल चोंट-
रही अर्थात् तोड़रहीथी उससमय खिलेहुए उसके कुचके
( १८२ ) सतसई-सटीक ।
कोरकी कांतिको बढते, तथा गोरी भुजाकी मूल और त्रिवली
देखकर मेरा मन लुटगया “ विभावना ” ॥ ५५६ ॥
अपने गुहिकर आपही, हिय पहिराइ लाल ।
नौलसिरी औरै चढ़ी, मौलसिरीकी माल ५५७॥
कृष्ण ने अपने हाथसे आपही गूँथकर प्यारीके हृदयमें
माला पहराई उस मौलसिरीकी मालासे बालाके नई
शोभा कुछ औरही चढ़ी “भेदकातिशयोक्ति छेकानुप्रास”
नौल-नवल ॥ ५५७ ॥
तूज्यौंउझकिझाँपतिवदन, झुकतिविहँसिसतराय।
त्यौंगुलालमुठीझुठी, झझकावतु पियजाय ५५८
तू ज्यों २ उझककर मुख ढकती है निहुड़ती और हँसती
है त्यों त्यों गुलालकी झूठी मूठीसे प्रीतम झझकाजाताहै
“पर्यायोक्ति स्वभावोक्ति” ॥ ५५८ ॥
पीठ दियेही नेक मुरि, कर घूँघटपट टारि ।
भरि गुलालकी मूठिसों, गई मूठसी मारि ५५९॥
वह पीठ फेरेही नेक मुरिकर हाथसे घूँघटपट टारकर
गुलालकी मूठी भरकर जादूकी मूठसी मारगई “ जातिअ-
लंकार यमक” ॥ ५५९ ॥
षष्ठशतक ६. ( १८३ )
दियोजु पियलखिचखनिमैं, खेलत फागुखियाल।
बाढ़तहू अतिपीर सुनि, काढ़त बनत गुलाल५६०
हे सखी ! उसके प्रीतमने जो फाग खेलते समय उसकी
आंखोंमें गुलाल डाल दिया अतिपीर बढ़नेपर भी गुलाल
काढ़ते नहीं बनता पीर होनेका कारण यह कि प्रीतमके दर्श-
नमें बाधा पड़तीहै “अनुज्ञालंकार”॥ ५६० ॥
छुटत मुठी संगहि छुटी, लोकलाज कुलचाल ।
लगे दुहिन इकबारही, चलचित नैन गुलाल५६१
मूठीके छूटते साथही लोकलाज और कुलकी चाल छुटी
दोनोंके चलचित्त नयन और गुलाल एक साथही लगे “स-
होक्ति” ॥ ५६१ ॥
गिरे कम्पि कछु कछु रहे, कर पसीज लपटाय ।
डारतमुठी गुलालकी, छुटतझूँठी ह्वै जाय ॥५६२॥
हे सखी ! कुछ तो हाथ कम्पित होनेसे गिरताहै कुछ हाथ
पसीज रहेहैं उनसे लपटजाताहै गुलालकी मुट्ठी डालनाहै प-
रन्तु छूटनेकी झूठी होजातीहै सात्त्विक होनेसे हाथोंमें कम्प
और पसीजना होताहै “विशेषोक्ति” ॥ ५६२ ॥
ज्यों ज्यों पटक झटक हटति, हँसतिनचावतिनैन।
त्यों त्यों निपट उदारह्वै, फगुआ देतबैनन ॥५६३॥
( १८४ ) सतसई-सटीक ।
प्यारी ज्यों ज्यों वस्त्रको पटकती झटकती हटकती नेत्र
नचाती हँसतीहै त्यों त्यों निपट उदार प्रीतमकोभी फगुआ
देते नहीं बनता, आशय यह कि, फगुआ देनेसे फिर यह
लीला न करेगी "विशेषोक्ति" उदारता होकर भी न देना ५६३
रसभिजयेदोऊदुहुनि, तउटिकरहे टरैंन ।
छबिसों छिरकत प्रेमरँग, भरिपिचकारीनैन ५६४॥
रससे दोनोंने दोनोंको भिजोदिया, तो भी डटरहे हैं टारेसे
टलते नहीं छबिसे प्रेमका रंग छिड़कते हैं और वह प्रेमका रंग
नेत्रोंकी पिचकारीमें भरते हैं "रूपक" [रस-प्रेम, जल] ५६४
छकि रसाल सौरभ सन, मधुर माधुरी गन्ध ।
ठौर ठौर झोरत फिरत, भौंरभीर मधु अंध ५६५॥
मोरकी सुगन्धसे छकके तथा मीठी माधुरी गंधमें सनकर
मकरन्दके मद्यसे अंधीहुई भौरोंकी भीर ठौरठौर गूंजती फि-
रतीहै "जाति अलंकार" ॥ ५६५ ॥
दिशिदिशि कुसुमितदेखिये, उपवन विपिनसमाज।
मनहुवियोगनकोकियो, शरपञ्जरऋतुराज ५६६
दिशा दिशाओंमें उपवन और वनका समाज फूलाहुवा
है मानों वसन्तऋतुने वियोगियोंको बाणोंका पींजरा कियाहै,
जैसे बहेलिये पक्षियोंको पकडनेको जाल बिछाते हैं इसप्र-
षष्ठशतक ६. ( १८५ )
कारसे वसन्तने फूलोंका पींजरा कियाहै विरहीजनोंके वि-
रुद्ध किया है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ५६६ ॥
फिर घरको नूतन पथिक,चले चकित चितभागि।
फूल्यो देखि पलाशवन,समुहैसमुझिदवागि५६७
नवीन पथिक चकित चित्त होकर घरको फिरकर भाग
चले, वनमें ढाका फूला देखकर सामने आग लगी हुई जानी
"भ्रान्त्यालंकार" ॥ ५६७ ॥
नाहिं न ये पावक प्रवल, लुएँ चलत चहुँपास ।
मानहुविरहवसन्तके, ग्रीषमलेतउसास ॥५६८॥
यह प्रवल अग्नि नहीं हे, जो चारों ओर लुएँ चलती
हैं मानों वसन्तके विरहमें ग्रीष्म उसास लेता हे
"हेतूत्प्रेक्षा" ॥ ५६८ ॥
कहलाने एकत रहत,अहि मयूर मृग बाघ ।
जगत तपोवनसो कियो, दीरघ दाघ निदाघ ॥
दुःख पाकर एकत्र रहते हैं सर्प, मोर, मृग और सिंह
ग्रीष्मकी बड़ी गर्मीने संसारको तपोवनसा करदिया हे जैसे
तपोवनमें सब जीव निर्वैर रहते हैं इसप्रकार गर्मीसे व्याकु-
ल हो यह सब जीव एकत्र स्थित हैं "पूर्णोपमा" दीरघ-
बडी । दाघ-दाह । निदाघ-गर्मी ॥ ५६९ ॥
( १८६ ) सतसई-सटीक ।
बैठिरही अति सघनवन, पैठि सदनमनमाँहि ।
निरखि दुपहरी जेठकी,छाँहौं चाहत छाँहि ५७०
अतिघने वनमें, अथवा मनरूपी घरमें बैठरहीं जेठकी
दुपहरी देखकर छाँहभी छाँह चाहती है वृक्षके नीचे छाँह
मानों दुपहरी देखकर आती है आशय यह कि,ज्येष्ठमें सघन
वन या मनके भीतरही छाँह मिलसकती है "हेतूत्प्रेक्षा"५७०
पावस घन अँधियारमें, रहो भेद नहिं आन ।
राति द्योस जान्यो परे,लखि चकई चकवान ५७१
वर्षाऋतुके घने अंधकार और रात्रिमें कुछ भेद नहीं
रहा केवल चकवा चकवीकोही देखकर रात दिनका बोध
होता है जब वह पृथक् हो बोलने लगते हैं तब रात जब
संयुक्त होते हैं तब दिनका बोध होता है "परिसंख्यालंकार"
पावस वर्णन है ॥ ५७१ ॥
तिय तरसोहें मुनि किये, करि सरसोहें नेह ।
धर परसोहें ह्वै रहे, झरबरसोहें मेह ॥ ५७२ ॥
हे तिया! तैं ने प्रेमसे सरस करके मुनिजन भी तरसत हुए
करदिये यह झरसे वरसनवाले मेघ पृथ्वीको छूते हुएसे
होरहे हैं ॥ ५७२ ॥
कुढँग कोप तजि रँगरली,करत युवति जग जोय।
षष्ठशतक ६. ( १८७ )
पावस बात न गूढ यह, वूढीहू रंग होय ॥५७३॥
अरी मानवती यही कुढंगका क्रोध त्यागकर; जगमें जो
रंगीली स्त्री हैं सो आनंद करती हैं पावसऋतुमें यह बात
छिपी नहीं है वूढियोंकोभी रंग होता है "काव्यलिंग और
श्लेष" ॥ ५७३ ॥
हठ न हठीली करसकै, इहि पावस ऋतु पाय ।
आन गांठि छुटिजाय त्यों, मानगांठि छुटिजाय॥
इस पावस ऋतुको प्राप्त करके हठीली हठ नहीं करस-
कती । पावस ( वर्षा ) को पाकर जैसे और गांठ छुटजाती
है इसीप्रकार मान गाँठभी छूट जाती है "विभावना-
लंकार" ॥ ५७४ ॥
वेऊ चिरजीवी अमर, निधरक फिरो कहाय ।
छिन बिछुरै जिनकी नहिं न, पावस आव सिराय ॥
वेही चिरंजीवी अमर कहाकर निधडक फिरो कि, जि-
नकी वर्षाऋतुमें क्षणमात्रकोभी पृथक होनेकी प्रतिज्ञा
नहीं गई है, अर्थात् जो पियाके बिना पावसमें जीती रहें
वेही अमर जानो "मरणाक्षेपालंकार" ॥ ५७५ ॥
अब तज नाम उपायको, आयो सावनमास ।
खेलन रहिबो खमसों, केम कुसुमकी बास॥५७६॥
( १८८ ) सतसई-सटीक ।
सखी अब सावन महीना आगया विरह दूर होनेके उपा-
यका नाम त्यागदो कदम्बफूलकी गन्धसे कुशलपूर्वक रहना
कोई खेल नहीं है “लोकोक्ति” शरद्वर्णन ॥ ५७६ ॥
घन घेरो छुटिगो हरषि, चली चहूँ दिशि राह ।
कियो सुचैनो आय जग, शरद शूर नरनाह ५७७॥
मेघोंका घेरा छूटगया प्रसन्नहो चारों दिशाओंके मार्ग
चले शरद् ऋतुरूपी शूर राजाने आकर जगतको सुचैन
किया “रूपालंकार” ॥ ५७७ ॥
अरुणसरोरुह कर चरण, दृग खंजन मुखचंद ।
समय आय सुन्दरि शरद, काहि न करत अनंद॥
लाल कमलरूपी हाथ पैर, खञ्जन नेत्र, चन्द्रमारूप
मुखसे सुन्दर शरद्का समय आकर किसको आनंदित नहीं
करता “रूपकालंकार” ॥ ५७८ ॥
हेमन्तवर्णन ।
ज्यों ज्यों बढति विभावरी, त्यों त्यों बढत अनन्त।
ओक ओक सबलोक सुख, कोक शोक हेमन्त॥
ज्यों ज्यों रात बढती है, त्यों त्यों सबलोकमें घर घर
आनंद बढते हैं हेमन्तमें चक्रवाकोंको शोक है कारण किं,
बडी रातमें उनको अधिक वियोग होता है “निदर्शना-
लंकार” ॥ ५७९ ॥
षट्शतक ६. ( १८९ )
मिलिविहरतबिछुरत मरत,दम्पति अति रसलीन।
नूतन विधि हेमन्त सब,जगत जुराफा कीन ५८०
दोनों स्त्री पुरुष रसमें लीन होकर विहार करते हैं वियु-
क्त होतेही मृतकवत् दुःखी होते हैं जाडेने अनोखी रीतिसे
सब जगत् जुराफेके समान कियाहै जुराफा एक पक्षी होताहै
ईरानमें इसको गावपलंग कहते हैं पैर गायकेसे, रंग चीतेकासा,
आशय यह कि, जैसा वह रंगबिरंगा होताहै इसीप्रकार उसने
जगत्को रंग बिरंगा कियाहै अर्थात् माह धूपमें लोग अनेक
प्रकारकी छींट शाल दुशाले पहनकर रंग बिरंगे होजाते हैं
अथवा जुराफः अफ्रीका देशके नूबह देशका पशुहै यह
सिंहके समान चित्तल और ऊंट के समान लम्बी गर्दन-
वाला होता है इनका जोडा बिछुड़नेसे दम्पतिका मरण हो-
ता है "रूपकालंकार" ॥५८०॥
कियो सबै जग कामवश, जीते सबै अजेय।
कुसुमशरहिं शर धनुपकर, अगहन गहन न देय॥
जिसने सब जगत्को कामके आधीन किया, सब अजे-
योंको जीतलिया अगहनका महीना उसी कामदेवके, धनुष
बाण हाथमें धारण करने नहीं देता अर्थात् जाडेमें उसके हाथ
पैरभी सुकड़ते हैं "अभिप्राय विशेष" ॥५८१॥
( १९० ) सतसई-सटीक ।
आवत जात न जानियत, तेजहि तजि सियराना।
घरहि जमाईलों धस्यो, खस्यो पूषदिनमान५८२
आते और जाते जाना नहीं जाता तेजको त्यागकर शी-
तल होगया है घरमें जमाईकी सम घुसा हुआ पूषका दिन
खसकताहै आशय यह ससुरालमें जमाईभी सकुचवश शीतल
हुआ रहताहै " पूर्णोपमा" ॥ ५८२ ॥
तपनतेज तपताप तन, तूल तुलाई माह ।
शिशिर शीत क्योंहुनघटै, बिनलपटेटियबांह५८३
सूर्यके तेजसे आगके तापनेसे रुईकी रजाईसेभी माहके
महीनेमें बिना प्यारीको भुजा भरके लपटाये शिशिरका
शीत किसी भांति नहीं घटता "परिसंख्या"[ दो०-कहूँ तो
अर्थ निषेधकर, और कहूँ ठहराय। तेहि परिसंख्या कहत हैं,
सो यहँ प्रगट लखाय] ॥ ५८३ ॥
लगतसुभगशीतलकिरण, निशदिनसुखअवगाहि
माहशशीभ्रमसूरत्यों, रहतचकोरीचाहि॥५८४ ॥
सूर्यकी किरण दिन रातके समान सुखदायक और शीत-
ल विदित होतीहै दिनमेंही यह सुख विचारकर माह महीनेमें
चकोरी सूरजको भ्रमसे चन्द्रमा जानकर देखरही है " भ्रांति
अलंकार " ॥ ५८४ ॥
षट्शतक ६. ( ५०.१ )
रह न सकी सब जगतमें, शिशिरशीतके पास ।
गरमिभाजगढमेंगई, तियकुचअचलमवास५८५
शीतके त्राससे गरमी इस जगतमें रह नहीं सकी इसका-
रण तियके कुचरूपी पहाडके मवासपर गढमें भाजकर
गरमी हुई अर्थात् छिपी । मवास-शरणस्थान "लुप्तोत्प्रेक्षारू-
पकालंकार" ॥ ५८५ ॥
रणित भृंग घंटावली, झरित दान मधुनीर ।
मन्द मन्द आवत चल्यो, कुंजर कुंज समीर५८६
भौंरोंकी ध्वनिही मानों घंटोंका समूहहै, मधु नीररूप
जिसमें मद झरताहै इसप्रकार कुंजमें पवनरूपी हाथी सहज
सहज चलाआताहै "रूपकालंकार" ॥ ५८६ ॥
रुक्यो सांकरेकुंजमग, करत झांझ झुकरात ।
मन्द मन्द मारुत तुरंग, खुदरत आवतजात५८७॥
संकीर्ण कुंजमार्गमें रुककर झांझ करना और झुकराता
है, सहज २ पवनरूपी घोडा खूँदता हुआ आताजाता है ।
सांकरे-कमचौडा । झांझ-चिरचिराहट । झुकरात-उधर उ-
धर झकोरालेना, खुदरत-खूँदना "रूपकालंकार" ॥५८७॥
चुवत स्वेद मकरन्दकण, तरुतरुतर विश्रमाय ।
आवतदक्षिणतें चल्यो, थक्योबटोहीवाय॥५८८॥
( १९२ ) सतसई-सटीक ।
परागका कणही पसीना चूताहै, प्रत्येक वृक्षके नीचे ठह-
रता हुआ थके हुए पथिकके समान वायु दक्षिणते आताहै ।
विरमाय-ठहरना "रूपकालंकार" ॥५८८॥
रहेरुके क्योंहूँ सुचलि, अधिकराति पधारि ।
हरति ताप सब द्योसको, उरलग यार बयारि ५८९
दिनभर रुकेरहे कहीं चलकर फिर आधीरातको पधारे
यार (मित्र) रूपपवनने हृदयसे लगकर सबदिनके ताप-
हरलिये हैं "छेकापह्नुति" अथवा नायकाने कहा दिनभर कहीं
रहकर रात्रिके समय हृदयसे लग ताप दूर कियाहै
(सखीने कहा) यार बालाने कही पवन ॥५८९॥
लपटी पुहुप पराग पट, सनी स्वेदमकरन्द ।
आवतनारिनवोढ़लों, सुखद वायगतिमन्द॥५९०
फूलोंके परागरूपी वस्त्र और फूलोंके रसरूपी पसीनेसे
सनी सुख देनेवाली पवन मन्दगतिसे नवोढा स्त्रीके समान
आतीहै नवोढा नई विवाहिता "रूपकालंकार" ॥५९०॥
चटक न छांडत घटतहू, सज्जन नेह गंभीर ।
फीको परै न बर घटै, रँगो चोल रँग चीर ॥५९१॥
स्नेहमें गंभीर सज्जन धन आदिसे घटतेभी चटक नहीं
छोडते बल घटनेसेभी मंजीठका रँगा कपडा फीका नहीं
षट्शतक ६. ( १९३ )
पड़ता “अर्थान्तरन्यासालंकार” [ दोहा:-कही जाय कहुँ
बात जो, अर्थान्तर चलिजाय । सो अर्थान्तर न्यास है, बुध
जन परत लखाय ॥ ५९१ ॥
दुर्जनवर्णन ।
नये विससिये अतिनये, दुर्जन दुसह स्वभाव ।
आंडे परि प्राणनहरै, कांटेलों लगि पांव ॥ ५९२ ॥
हे मित्र ! दुर्जन दुःसह स्वभाववालोंका विश्वास न करो
चाहे अतिनम्र होते हों अथवा नये विश्वासीकी ओर मत
देख यह कांटेके समान पाँवमें लगकर दांव पड़नेसे प्राण-
तक हरण करलेते हैं “पूर्णोपमा” ॥ ५९२ ॥
जेती सम्पति कृपणकी, तेती सू अत जोरि ।
बढ़त जाँय ज्योंज्यों उरज, त्योंत्यों होत कठोर ॥
जितनी सम्पत्ति कृपणके यहां है उतनी सू अत जोरि
देखो ज्यों २ कुच बढ़ते जाते हैं त्यों २ कठोर होतेजाते हैं ।
“दृष्टान्तालंकार” ॥ ५९३ ॥
नीच हिये हुलसे रहें, गहे गेंदके पोत ।
ज्यों ज्यों माथे मारिये, त्यों त्यों ऊँचो होत ॥
गेंदका गुण ग्रहण किये नीच लोग मनमें प्रसन्न रहते हैं
२५
( १९४ ) सतसई-सटीक ।
ज्यों ज्यों उनके माथेमें मारै त्यों २ ऊँचे होते हैं "दृष्टान्ता-
लंकार" कृपणके समान धन संग्रह करनेवालेकी नि-
न्दाहै ॥ ५९४ ॥
कोटि यतन कोऊ करै, परै न प्रकृतिहि बीच ।
नलबल जल ऊंचे चढै, अन्त नीचको नीच ५९५
चाहै कोई कोटि यत्न करै परन्तु स्वभावमें अन्तर नहीं
पडता देखो नलके बलसे जल ऊँचे चढ़ताहै परन्तु अन्तमें
नीचेहीको आताहै नीच प्रकृति है ( नल-फुहारेका )
"दृष्टान्तालंकार" ॥ ५९५ ॥
गढरचना वरुनीं अलक, चितवन भाहकमान ।
आव बँकाईही बढै, तरुणि तुरंगम तान ॥५९६॥
गढ़की रचना, बरौनी-पलकके बाल अलक ( जुल्फ )
चितवन भौंह कमान तरुणी ( स्त्री ) घोडा और हाथी इनकी
आव ( प्रतिष्ठा ) बांकेपनसेही बढ़ती है, अथवा तुरंगम घोडा
और तान "दीपिकालंकार" ॥ ५९६ ॥
तन्त्री नाद कवित्त रस, सरस राग रतिरंग ।
अनबूडे बूडे तरे, जे बूडे सब अंग ॥ ५९७ ॥
वीणाका शब्द, कविताईका रस, रसभरे राग रतिरंग, जो
षटशतक ६. ( १९५ )
इनमें नहीं डूबेहैं सो तो डूबे और जो इनमें सर्वांगसे डूबे हैं
वेतेरेहैं " विरोधाभास " ॥ ५९७ ॥
सम्पति केश सुदेश नर, नवत दुहुँनि यकवानि।
विभवसतरकुचनीचनर, नरमविभवकीहानि ॥
सम्पत्तिमें केश और भले मनुष्य नवतेहैं दोनोंकी एकही
बानहै, जैसे ऐश्वर्यमें कुच और नीच नर कठोर होतेहैं ऐश्व-
र्यकी हानिमें नरम होतेहैं "दीपकमालालंकार" जहाँ उप-
मान उपमेयसे एक पद लगताहै वह दीपक माला ॥ ५९८॥
कैसे छोटे नरनसों, सरत बड़नके काम ।
मढो दमामो जातहै, कहिं चूहेके चाम ॥५९९॥
छोटे मनुष्योंसे बड़ोंके काम किसप्रकार सर सकते हैं
कहीं चूहेके चामसे (दमामा) ऊँट पर रखनेका नगाड़ा
मढ़ा जासकताहै कभी नहीं " दृष्टांत " ॥ ५९९ ॥
ओछे बड़े हुए सकें
( १९६ ) सतसई-सटीक ।
प्यासे दुपहर जेठके, थके सबै जल शोधि।
मरु धर पायमतीरही, मारू कहति पयोधि॥६०१
दुपहरके प्यासे जेठ महीनेमें पथिक सब ओर जल ढूंढ
कर थकगये, और मारवारकी भूमिमें बड़े तरबूजको पाकर
उसको दूधका सागर कहतेहैं, यह मारवाडमें जाकर कहाथा
“ प्रहर्षणांलंकार ” ॥ ६०१ ॥
विषम वृषादिककी तृषा, जिये मतीरनि शोधि ।
अमित अपार अगाध जल, मारो मूंड पयोधि॥
कठिन वृषके सूर्य ( ज्येष्ठ महीने ) की प्यासमें जो कि,
दुःसह होती है, उसमें जो मनुष्य तरबूजको ढूंढ जल पान
करतेहैं वे कहते हैं कि, इसके सामने महा अपार गहरे जल-
वाले समुद्रको शिरसे मारो अर्थात् सागरसे हमें कुछ काम
नहीं “अन्योक्तिअलंकार” ॥ ६०२ ॥
अतिअगाध अति ऊथरो, नदी कूप सर बाय।
सो ताको सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाय॥६०३
नदी कूप सरोवर बावडीका अति गहरा या उथला पानी
हो परन्तु उसका वही सागरहै जहां जिसकी प्यास बुझजाय,
किसी पुरुषकी लग्न किसी कामिनीसे लगी. और उसकीही
गुणकथा गाई इसपर सखीने कहा “अन्योक्तिअलंकार” ६०३
सतमशतक ७. (३९७)
मीत न नीति गलीतहै, जो धरिये धन जोरि।
खाये खरचे जो बचै, तो जोरिये करोरि॥ ६०४॥
हेमित्र! यह नीति नहीं जो अपनी दुर्दशा बनाकर धन
जोड़ रक्खे जो खाये खरचेसे बचै तो करोंड़ों जोड़ो "सम्भा-
वना"॥ ६०४॥
दुसह दुराज प्रजानमें, क्यों न करै अतिद्वंद्व।
अधिक अँधेरो मिलि करत, मिलि मावस रविचंद
कठिन बुरे राज्यमें प्रजाके दुःख और क्लेश क्यों न बढ़ें
अमावसके दिन सूर्य चन्द्रमा एक राशिपर होकर अधिक
अंधकार करतेहैं "दृष्टान्त" जयसिंहके उपगम समय
कहाहै॥ ६०५॥
घर घर डोलत दीन ह्वै, जन जन याचत जाय।
दिये लोभ चश्मा चखनि, लघु पुनि बड़ो लखाय॥
घर घर दीन होकर डोलताहै प्रत्येक जनको याचना
जाता है जिसकी आँखोंमें लोभका चश्मा लगा है उसको
छोटा भी बड़ा दीखताहै "रूपक"॥ ६०६॥
बसै बुराई जासु तनु, ताहीको सन्मान॥
भलो भलो कहि छाँड़िये, खोटे ग्रह जप दान॥
( १९८ ) सतसई-सटीक ।
जिसके शरीरमें बुराई होतीहै, उसीका सन्मान होताहै
भलेको तो अच्छा कह छोड़देते हैं, परन्तु खोटे ग्रहका जप
दान करते हैं “लौकिकदृष्टान्त” ॥ ६०७ ॥
कहैं यहै श्रुति स्मृतिनसों, सबै सयाने लोग ।
तीन दबावत निकसही, राजा पातिक रोग ६०८॥
वेदशास्त्र और सब सयाने लोग यह बात कहतेहैं कि, राजा
पाप और रोग यह तीनों निर्बलको तुरत दबातेहैं अथवा
राजा निर्बलको अवल देहको रोग दबातेहैं निकस-निर्बल
“दीपकालं” ॥ ६०८ ॥
इक भीजे चहले परे, बूडे बहे हजार ।
कितने अवगुण जग करत, नैवे चढती बार ६०९
कोई भीगे कोई चहले (दलदल) में पड़े कोई डूबे और
सहस्रों बहगये नई अवस्थारूपी नदीके चढते समय कितने
अवगुण नहीं करती है “उल्लासालंकार ॥ ६०९ ॥
गुणी गुणी सबकोउ कहत, निगुणी गुणी न होत।
सुनो कबहुँ तरु अर्कते, अर्क समान उदोत ६१०
सब कोई गुणी २ कहतेहैं परन्तु किसीके कहनेसे निर्गुणी
गुणी नहीं होता, कहीं किसीने आकके पेडसे सूरजके समान
चांदना सुनाहै अर्क-सूरज और आक “न्यासालं-
कार” ॥ ६१० ॥
सप्तमशतक ७. ( १२२ )
संगति सुमति न पावहीं, परे कुमतिके धंध ।
राखो मेल कपूरमें, हींग न होय सुगंध ॥६११॥
जो बुद्धि कुमतिमें फँसजातीहै तो फिर मनुष्य संगतिसे
सुमति नहीं पाता चाहे कपूरमें डाल रक्खो परन्तु हींगमें सु-
गंध नहीं होती "अतद्गुणालंकार" ॥ ६११ ॥
सबै हँसत करतार दे, नागरताके नाँव ।
गयो गव गुणको सबै, बसे गमेले गाँव ॥ ६१२ ॥
नागरता चतुराईके नाम से सब ताली बजाकर हँसते हैं,
गँवारू गांवमें निवास करनेसे गुणका गर्व सब जातारहा "ले-
शालंकार" ॥ ६१२ ॥
सोहत संग समानसों, यहै कहैं सबलोग ।
पानपीक ओठन बने, काजर नैनन योग॥६१३॥
संग समानसे शोभित होताहै, सब लोग यही कहते हैं,
पानकी पीक होंठोंमें भली लगतीहै, और काजर नेत्रों-
हींके योग्यहै, होंठ लालहैं पानकी पीकभी लाल है
नेत्र श्यामहैं काजरभी श्यामहै, इसकारण दोनों शोभा यो-
ग्यतासे पातेहैं "समालंकार" ॥ ६१३ ॥
जो शिरधर महिमा मही, लहियत ग ना गव ।
प्रगटत जडता अपनी, मुकुट पागियन पाँव ॥
( २०० ) सतसई-सटीक ।
जिसको शिरपर धारण कर राजा और राव संसार अपनी
बडी प्रतिष्ठा प्राप्त करतेहैं, यदि मुकुटको पाँवमें पहरे तो
अपनी जडता प्रगट करतेहैं आशय यह कि, श्रेष्ठ लोक मुक-
टके समानहैं उनको जो शिर धरते अर्थात् आदर करतेहैं
वे बडाई पातेहैं, जो निरादर करतेहैं वे अपनी मूर्खता
प्रगट करते हैं “ अन्योक्तिअलंकार ” ॥ ६१४ ॥
अरे परेखो क्यों करै, तुही विलोक विचारि ।
केहि नर केहि सर राखिये, खरे बढेपर पारि ६१५
अरे अब परीक्षा कौन करै तूही विचारकर देख अच्छी
प्रकार बढते किस मनुष्य और किस सरोवरने मर्यादा रक्खी
है “ दीपकालंकार ” ॥ ६१५ ॥
बुरे बुराई जो तजैं, तौ मन खरो सकात ।
ज्यों निकलंक मयंक लखि, गिनैं लोग उतपात ॥
जो बुरे बुराई त्यागदें तो उनसे मन बहुत डरता है जैसे
निष्कलंक चंद्रमाको देखकर लोग उतपात मानते हैं “दृष्टा-
न्तालंकार” ॥ ६१६ ॥
भाँवरि अनभाँवरि भरो, करो कोटि बकवाद ।
अपनी अपनी भाँतिको, छुटै न सहज सवाद ६१७
रुचिमें अरुचि करो करोड़ बकवाद करो परन्तु अपनी २