बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 234, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठशतक ६. ( १८१ )
मुख धोय जल हाथमें ले शिरको झुवाय बालोंको भिजोय
मुड़कर ऊँची होकर घुटनोंतक नवकर नारि सरोवरमें स्नान
करतीहै "जातिअलंकार" ॥ ५५३ ॥
छिरके नाह नवोढ दृग, करि पिचकी जलजोर ।
रोचनरँग लाली भई, विय तिय लोचनकोर ५५४॥
प्रीतमने जलके जोरसे नवोढाके नेत्र छिड़के, और
उसीसमय दूसरी सौतके नेत्रोंकि कोयोंमें गोरोचनके समान
लालीहुई "असंगति" ॥ ५५४ ॥
चलतललितश्रमस्वेदकण, कलितअरुणमुखऐन ।
वनविहारथाकी तरुनि, खरे थकाये नैन ॥५५५॥
चलनेसे जो मनोहर पसीनेके कण आगये उससे मुख-
रूपी स्थान लालीकी शोभायुक्त हुआ; और जब विहारकर
तरुणी थकित हुई तब उसके प्रीतमके नैन उसे देखते २ थ-
कित होगये । “ जाति० ” ॥ ५५५ ॥
बढतविकसिकुचकोररुचि, कढ़त गौरभुजमूल ।
मनु लुटगो लोटनु चढत, चूटत ऊँचे फूल ५५६॥
प्रियवचन सखीसे, जिस समय वह ऊँचा हाथकर फूल चोंट-
रही अर्थात् तोड़रहीथी उससमय खिलेहुए उसके कुचके