सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 250

सतमशतक ७. (३९७)
मीत न नीति गलीतहै, जो धरिये धन जोरि।
खाये खरचे जो बचै, तो जोरिये करोरि॥ ६०४॥
हेमित्र! यह नीति नहीं जो अपनी दुर्दशा बनाकर धन
जोड़ रक्खे जो खाये खरचेसे बचै तो करोंड़ों जोड़ो "सम्भा-
वना"॥ ६०४॥
दुसह दुराज प्रजानमें, क्यों न करै अतिद्वंद्व।
अधिक अँधेरो मिलि करत, मिलि मावस रविचंद
कठिन बुरे राज्यमें प्रजाके दुःख और क्लेश क्यों न बढ़ें
अमावसके दिन सूर्य चन्द्रमा एक राशिपर होकर अधिक
अंधकार करतेहैं "दृष्टान्त" जयसिंहके उपगम समय
कहाहै॥ ६०५॥
घर घर डोलत दीन ह्वै, जन जन याचत जाय।
दिये लोभ चश्मा चखनि, लघु पुनि बड़ो लखाय॥
घर घर दीन होकर डोलताहै प्रत्येक जनको याचना
जाता है जिसकी आँखोंमें लोभका चश्मा लगा है उसको
छोटा भी बड़ा दीखताहै "रूपक"॥ ६०६॥
बसै बुराई जासु तनु, ताहीको सन्मान॥
भलो भलो कहि छाँड़िये, खोटे ग्रह जप दान॥