बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्शतक ६. ( १९३ )
पड़ता “अर्थान्तरन्यासालंकार” [ दोहा:-कही जाय कहुँ
बात जो, अर्थान्तर चलिजाय । सो अर्थान्तर न्यास है, बुध
जन परत लखाय ॥ ५९१ ॥
दुर्जनवर्णन ।
नये विससिये अतिनये, दुर्जन दुसह स्वभाव ।
आंडे परि प्राणनहरै, कांटेलों लगि पांव ॥ ५९२ ॥
हे मित्र ! दुर्जन दुःसह स्वभाववालोंका विश्वास न करो
चाहे अतिनम्र होते हों अथवा नये विश्वासीकी ओर मत
देख यह कांटेके समान पाँवमें लगकर दांव पड़नेसे प्राण-
तक हरण करलेते हैं “पूर्णोपमा” ॥ ५९२ ॥
जेती सम्पति कृपणकी, तेती सू अत जोरि ।
बढ़त जाँय ज्योंज्यों उरज, त्योंत्यों होत कठोर ॥
जितनी सम्पत्ति कृपणके यहां है उतनी सू अत जोरि
देखो ज्यों २ कुच बढ़ते जाते हैं त्यों २ कठोर होतेजाते हैं ।
“दृष्टान्तालंकार” ॥ ५९३ ॥
नीच हिये हुलसे रहें, गहे गेंदके पोत ।
ज्यों ज्यों माथे मारिये, त्यों त्यों ऊँचो होत ॥
गेंदका गुण ग्रहण किये नीच लोग मनमें प्रसन्न रहते हैं
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