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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 235

( १८२ ) सतसई-सटीक ।
कोरकी कांतिको बढते, तथा गोरी भुजाकी मूल और त्रिवली
देखकर मेरा मन लुटगया “ विभावना ” ॥ ५५६ ॥
अपने गुहिकर आपही, हिय पहिराइ लाल ।
नौलसिरी औरै चढ़ी, मौलसिरीकी माल ५५७॥
कृष्ण ने अपने हाथसे आपही गूँथकर प्यारीके हृदयमें
माला पहराई उस मौलसिरीकी मालासे बालाके नई
शोभा कुछ औरही चढ़ी “भेदकातिशयोक्ति छेकानुप्रास”
नौल-नवल ॥ ५५७ ॥
तूज्यौंउझकिझाँपतिवदन, झुकतिविहँसिसतराय।
त्यौंगुलालमुठीझुठी, झझकावतु पियजाय ५५८
तू ज्यों २ उझककर मुख ढकती है निहुड़ती और हँसती
है त्यों त्यों गुलालकी झूठी मूठीसे प्रीतम झझकाजाताहै
“पर्यायोक्ति स्वभावोक्ति” ॥ ५५८ ॥
पीठ दियेही नेक मुरि, कर घूँघटपट टारि ।
भरि गुलालकी मूठिसों, गई मूठसी मारि ५५९॥
वह पीठ फेरेही नेक मुरिकर हाथसे घूँघटपट टारकर
गुलालकी मूठी भरकर जादूकी मूठसी मारगई “ जातिअ-
लंकार यमक” ॥ ५५९ ॥