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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 239

( १८६ ) सतसई-सटीक ।
बैठिरही अति सघनवन, पैठि सदनमनमाँहि ।
निरखि दुपहरी जेठकी,छाँहौं चाहत छाँहि ५७०
अतिघने वनमें, अथवा मनरूपी घरमें बैठरहीं जेठकी
दुपहरी देखकर छाँहभी छाँह चाहती है वृक्षके नीचे छाँह
मानों दुपहरी देखकर आती है आशय यह कि,ज्येष्ठमें सघन
वन या मनके भीतरही छाँह मिलसकती है "हेतूत्प्रेक्षा"५७०
पावस घन अँधियारमें, रहो भेद नहिं आन ।
राति द्योस जान्यो परे,लखि चकई चकवान ५७१
वर्षाऋतुके घने अंधकार और रात्रिमें कुछ भेद नहीं
रहा केवल चकवा चकवीकोही देखकर रात दिनका बोध
होता है जब वह पृथक् हो बोलने लगते हैं तब रात जब
संयुक्त होते हैं तब दिनका बोध होता है "परिसंख्यालंकार"
पावस वर्णन है ॥ ५७१ ॥
तिय तरसोहें मुनि किये, करि सरसोहें नेह ।
धर परसोहें ह्वै रहे, झरबरसोहें मेह ॥ ५७२ ॥
हे तिया! तैं ने प्रेमसे सरस करके मुनिजन भी तरसत हुए
करदिये यह झरसे वरसनवाले मेघ पृथ्वीको छूते हुएसे
होरहे हैं ॥ ५७२ ॥
कुढँग कोप तजि रँगरली,करत युवति जग जोय।