बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठशतक ६. ( १८३ )
दियोजु पियलखिचखनिमैं, खेलत फागुखियाल।
बाढ़तहू अतिपीर सुनि, काढ़त बनत गुलाल५६०
हे सखी ! उसके प्रीतमने जो फाग खेलते समय उसकी
आंखोंमें गुलाल डाल दिया अतिपीर बढ़नेपर भी गुलाल
काढ़ते नहीं बनता पीर होनेका कारण यह कि प्रीतमके दर्श-
नमें बाधा पड़तीहै “अनुज्ञालंकार”॥ ५६० ॥
छुटत मुठी संगहि छुटी, लोकलाज कुलचाल ।
लगे दुहिन इकबारही, चलचित नैन गुलाल५६१
मूठीके छूटते साथही लोकलाज और कुलकी चाल छुटी
दोनोंके चलचित्त नयन और गुलाल एक साथही लगे “स-
होक्ति” ॥ ५६१ ॥
गिरे कम्पि कछु कछु रहे, कर पसीज लपटाय ।
डारतमुठी गुलालकी, छुटतझूँठी ह्वै जाय ॥५६२॥
हे सखी ! कुछ तो हाथ कम्पित होनेसे गिरताहै कुछ हाथ
पसीज रहेहैं उनसे लपटजाताहै गुलालकी मुट्ठी डालनाहै प-
रन्तु छूटनेकी झूठी होजातीहै सात्त्विक होनेसे हाथोंमें कम्प
और पसीजना होताहै “विशेषोक्ति” ॥ ५६२ ॥
ज्यों ज्यों पटक झटक हटति, हँसतिनचावतिनैन।
त्यों त्यों निपट उदारह्वै, फगुआ देतबैनन ॥५६३॥