बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठशतक ६. ( १८७ )
पावस बात न गूढ यह, वूढीहू रंग होय ॥५७३॥
अरी मानवती यही कुढंगका क्रोध त्यागकर; जगमें जो
रंगीली स्त्री हैं सो आनंद करती हैं पावसऋतुमें यह बात
छिपी नहीं है वूढियोंकोभी रंग होता है "काव्यलिंग और
श्लेष" ॥ ५७३ ॥
हठ न हठीली करसकै, इहि पावस ऋतु पाय ।
आन गांठि छुटिजाय त्यों, मानगांठि छुटिजाय॥
इस पावस ऋतुको प्राप्त करके हठीली हठ नहीं करस-
कती । पावस ( वर्षा ) को पाकर जैसे और गांठ छुटजाती
है इसीप्रकार मान गाँठभी छूट जाती है "विभावना-
लंकार" ॥ ५७४ ॥
वेऊ चिरजीवी अमर, निधरक फिरो कहाय ।
छिन बिछुरै जिनकी नहिं न, पावस आव सिराय ॥
वेही चिरंजीवी अमर कहाकर निधडक फिरो कि, जि-
नकी वर्षाऋतुमें क्षणमात्रकोभी पृथक होनेकी प्रतिज्ञा
नहीं गई है, अर्थात् जो पियाके बिना पावसमें जीती रहें
वेही अमर जानो "मरणाक्षेपालंकार" ॥ ५७५ ॥
अब तज नाम उपायको, आयो सावनमास ।
खेलन रहिबो खमसों, केम कुसुमकी बास॥५७६॥