बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्शतक ६. ( ५०.१ )
रह न सकी सब जगतमें, शिशिरशीतके पास ।
गरमिभाजगढमेंगई, तियकुचअचलमवास५८५
शीतके त्राससे गरमी इस जगतमें रह नहीं सकी इसका-
रण तियके कुचरूपी पहाडके मवासपर गढमें भाजकर
गरमी हुई अर्थात् छिपी । मवास-शरणस्थान "लुप्तोत्प्रेक्षारू-
पकालंकार" ॥ ५८५ ॥
रणित भृंग घंटावली, झरित दान मधुनीर ।
मन्द मन्द आवत चल्यो, कुंजर कुंज समीर५८६
भौंरोंकी ध्वनिही मानों घंटोंका समूहहै, मधु नीररूप
जिसमें मद झरताहै इसप्रकार कुंजमें पवनरूपी हाथी सहज
सहज चलाआताहै "रूपकालंकार" ॥ ५८६ ॥
रुक्यो सांकरेकुंजमग, करत झांझ झुकरात ।
मन्द मन्द मारुत तुरंग, खुदरत आवतजात५८७॥
संकीर्ण कुंजमार्गमें रुककर झांझ करना और झुकराता
है, सहज २ पवनरूपी घोडा खूँदता हुआ आताजाता है ।
सांकरे-कमचौडा । झांझ-चिरचिराहट । झुकरात-उधर उ-
धर झकोरालेना, खुदरत-खूँदना "रूपकालंकार" ॥५८७॥
चुवत स्वेद मकरन्दकण, तरुतरुतर विश्रमाय ।
आवतदक्षिणतें चल्यो, थक्योबटोहीवाय॥५८८॥