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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 238

षष्ठशतक ६. ( १८५ )
कारसे वसन्तने फूलोंका पींजरा कियाहै विरहीजनोंके वि-
रुद्ध किया है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ५६६ ॥
फिर घरको नूतन पथिक,चले चकित चितभागि।
फूल्यो देखि पलाशवन,समुहैसमुझिदवागि५६७
नवीन पथिक चकित चित्त होकर घरको फिरकर भाग
चले, वनमें ढाका फूला देखकर सामने आग लगी हुई जानी
"भ्रान्त्यालंकार" ॥ ५६७ ॥
नाहिं न ये पावक प्रवल, लुएँ चलत चहुँपास ।
मानहुविरहवसन्तके, ग्रीषमलेतउसास ॥५६८॥
यह प्रवल अग्नि नहीं हे, जो चारों ओर लुएँ चलती
हैं मानों वसन्तके विरहमें ग्रीष्म उसास लेता हे
"हेतूत्प्रेक्षा" ॥ ५६८ ॥
कहलाने एकत रहत,अहि मयूर मृग बाघ ।
जगत तपोवनसो कियो, दीरघ दाघ निदाघ ॥
दुःख पाकर एकत्र रहते हैं सर्प, मोर, मृग और सिंह
ग्रीष्मकी बड़ी गर्मीने संसारको तपोवनसा करदिया हे जैसे
तपोवनमें सब जीव निर्वैर रहते हैं इसप्रकार गर्मीसे व्याकु-
ल हो यह सब जीव एकत्र स्थित हैं "पूर्णोपमा" दीरघ-
बडी । दाघ-दाह । निदाघ-गर्मी ॥ ५६९ ॥