सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

षट्शतक ६. ( १८९ )
मिलिविहरतबिछुरत मरत,दम्पति अति रसलीन।
नूतन विधि हेमन्त सब,जगत जुराफा कीन ५८०
दोनों स्त्री पुरुष रसमें लीन होकर विहार करते हैं वियु-
क्त होतेही मृतकवत् दुःखी होते हैं जाडेने अनोखी रीतिसे
सब जगत् जुराफेके समान कियाहै जुराफा एक पक्षी होताहै
ईरानमें इसको गावपलंग कहते हैं पैर गायकेसे, रंग चीतेकासा,
आशय यह कि, जैसा वह रंगबिरंगा होताहै इसीप्रकार उसने
जगत्‌को रंग बिरंगा कियाहै अर्थात् माह धूपमें लोग अनेक
प्रकारकी छींट शाल दुशाले पहनकर रंग बिरंगे होजाते हैं
अथवा जुराफः अफ्रीका देशके नूबह देशका पशुहै यह
सिंहके समान चित्तल और ऊंट के समान लम्बी गर्दन-
वाला होता है इनका जोडा बिछुड़नेसे दम्पतिका मरण हो-
ता है "रूपकालंकार" ॥५८०॥
कियो सबै जग कामवश, जीते सबै अजेय।
कुसुमशरहिं शर धनुपकर, अगहन गहन न देय॥
जिसने सब जगत्‌को कामके आधीन किया, सब अजे-
योंको जीतलिया अगहनका महीना उसी कामदेवके, धनुष
बाण हाथमें धारण करने नहीं देता अर्थात् जाडेमें उसके हाथ
पैरभी सुकड़ते हैं "अभिप्राय विशेष" ॥५८१॥