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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 252

सप्तमशतक ७. ( १२२ )
संगति सुमति न पावहीं, परे कुमतिके धंध ।
राखो मेल कपूरमें, हींग न होय सुगंध ॥६११॥
जो बुद्धि कुमतिमें फँसजातीहै तो फिर मनुष्य संगतिसे
सुमति नहीं पाता चाहे कपूरमें डाल रक्खो परन्तु हींगमें सु-
गंध नहीं होती "अतद्गुणालंकार" ॥ ६११ ॥
सबै हँसत करतार दे, नागरताके नाँव ।
गयो गव गुणको सबै, बसे गमेले गाँव ॥ ६१२ ॥
नागरता चतुराईके नाम से सब ताली बजाकर हँसते हैं,
गँवारू गांवमें निवास करनेसे गुणका गर्व सब जातारहा "ले-
शालंकार" ॥ ६१२ ॥
सोहत संग समानसों, यहै कहैं सबलोग ।
पानपीक ओठन बने, काजर नैनन योग॥६१३॥
संग समानसे शोभित होताहै, सब लोग यही कहते हैं,
पानकी पीक होंठोंमें भली लगतीहै, और काजर नेत्रों-
हींके योग्यहै, होंठ लालहैं पानकी पीकभी लाल है
नेत्र श्यामहैं काजरभी श्यामहै, इसकारण दोनों शोभा यो-
ग्यतासे पातेहैं "समालंकार" ॥ ६१३ ॥
जो शिरधर महिमा मही, लहियत ग ना गव ।
प्रगटत जडता अपनी, मुकुट पागियन पाँव ॥