बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८८ ) सतसई-सटीक ।
सखी अब सावन महीना आगया विरह दूर होनेके उपा-
यका नाम त्यागदो कदम्बफूलकी गन्धसे कुशलपूर्वक रहना
कोई खेल नहीं है “लोकोक्ति” शरद्वर्णन ॥ ५७६ ॥
घन घेरो छुटिगो हरषि, चली चहूँ दिशि राह ।
कियो सुचैनो आय जग, शरद शूर नरनाह ५७७॥
मेघोंका घेरा छूटगया प्रसन्नहो चारों दिशाओंके मार्ग
चले शरद् ऋतुरूपी शूर राजाने आकर जगतको सुचैन
किया “रूपालंकार” ॥ ५७७ ॥
अरुणसरोरुह कर चरण, दृग खंजन मुखचंद ।
समय आय सुन्दरि शरद, काहि न करत अनंद॥
लाल कमलरूपी हाथ पैर, खञ्जन नेत्र, चन्द्रमारूप
मुखसे सुन्दर शरद्का समय आकर किसको आनंदित नहीं
करता “रूपकालंकार” ॥ ५७८ ॥
हेमन्तवर्णन ।
ज्यों ज्यों बढति विभावरी, त्यों त्यों बढत अनन्त।
ओक ओक सबलोक सुख, कोक शोक हेमन्त॥
ज्यों ज्यों रात बढती है, त्यों त्यों सबलोकमें घर घर
आनंद बढते हैं हेमन्तमें चक्रवाकोंको शोक है कारण किं,
बडी रातमें उनको अधिक वियोग होता है “निदर्शना-
लंकार” ॥ ५७९ ॥