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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 251

( १९८ ) सतसई-सटीक ।
जिसके शरीरमें बुराई होतीहै, उसीका सन्मान होताहै
भलेको तो अच्छा कह छोड़देते हैं, परन्तु खोटे ग्रहका जप
दान करते हैं “लौकिकदृष्टान्त” ॥ ६०७ ॥
कहैं यहै श्रुति स्मृतिनसों, सबै सयाने लोग ।
तीन दबावत निकसही, राजा पातिक रोग ६०८॥
वेदशास्त्र और सब सयाने लोग यह बात कहतेहैं कि, राजा
पाप और रोग यह तीनों निर्बलको तुरत दबातेहैं अथवा
राजा निर्बलको अवल देहको रोग दबातेहैं निकस-निर्बल
“दीपकालं” ॥ ६०८ ॥
इक भीजे चहले परे, बूडे बहे हजार ।
कितने अवगुण जग करत, नैवे चढती बार ६०९
कोई भीगे कोई चहले (दलदल) में पड़े कोई डूबे और
सहस्रों बहगये नई अवस्थारूपी नदीके चढते समय कितने
अवगुण नहीं करती है “उल्लासालंकार ॥ ६०९ ॥
गुणी गुणी सबकोउ कहत, निगुणी गुणी न होत।
सुनो कबहुँ तरु अर्कते, अर्क समान उदोत ६१०
सब कोई गुणी २ कहतेहैं परन्तु किसीके कहनेसे निर्गुणी
गुणी नहीं होता, कहीं किसीने आकके पेडसे सूरजके समान
चांदना सुनाहै अर्क-सूरज और आक “न्यासालं-
कार” ॥ ६१० ॥